एल.जी.बी.टी.क्यू. भी अपनाते हैं भेदभाव

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Sunday, October 27, 2013-3:15 PM

नई दिल्ली,(मनीष राणा) : एल.जी.बी.टी.क्यू. कम्युनिटी (लेसबियन, गे, बॉयोसैक्सुअल, ट्रांसजेंडर,क्वीर और क्योश्चयोनिंग समुदाय) के लोगों को समाज में उपेक्षा व तिरस्कार की नजर से देखा जाता है। इस समुदाय में भी समाज की पुरुषवादी मानसिकता का असर दिखाई देता है। कम्युनिटी में शामिल लेसबियन खुद का ज्यादा असुरक्षित महसूस करती हैं।

गे भी लेसबियन के मुकाबले अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं। कम्युनिटी में शामिल ये लोग बातचीत के दौरान खुद मानते हैं कि पूरी कम्युनिटी ही खुद को तिरस्कृत और असुरक्षित महसूस करती है, मगर मैंटल व फिजिकल हरासमैंटका सबसे ज्यादा खतरा लेसबियन महिलाओं व युवतियों को रहता है। यहीं कारण है कि गे के मुकाबले लेसबियन बहुत कम सामने आ पाती हैं। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने एल.जी.बी.टी.क्यू. कम्युनिटी बना रखी है। इसमें बाहरी छात्र भी शामिल हैं। इस कम्युनिटी में कोॢडनेटर के तौर पर जुड़े एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.एशले टैलीस का कहना है कि लोगों की मानसिकता ऐसी है कि जहां लड़की देखो झपट पड़ो। यदि कोई लड़की किसी लड़की से प्रेम करती हैं, तो उसे सैक्स की नजर से देखा जाता हैं। यह सोचा जाने लगता है कि पुरुष के न मिल पाने और सैक्स की चाहत पूरी नहीं होने पर ही कोई महिला या युवती लेसबियन बनती हैं, जबकि ऐसा नहीं है।

यह लोगों की सोच हैं। यदि किसी लेसबियन के विषय में लोगों को जानकारी मिल जाए, तो उसके साथ मानसिक और शारीरिक शोषण का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यहीं कारण है कि जहां गे पुरुष हिम्मत कर सामने आ जाते है,वहीं लेसबियन ऐसा नही कर पाती। गे के मुकाबले लेसबियन को लोग ज्यादा बुरी नजरों से देखते हैं। आज गे परेड होती है, मगर लेसबियन के लिए आज तक कभी मिलने का कोई ऐसा स्थान नहीं है।

खुद कम्युनिटी से जुड़ी एक लेसबियन  युवती ने माना की वह खुद के मुकाबले समाज में गे पुरुषों का ज्यादा सुरक्षित मानती हैं,क्योंकि वह महिला हैं, तो वह पुरुष के मुकाबले ज्यादा असुरक्षित हैं। एशले टैलीस ने कहा कि उनकी कम्युनिटी के शुक्रवार को किए डिस्कशन में जहां दर्जनों की संख्या में गे पुरुष शामिल थे,वहीं केवल 2 लड़कियां ही आगे आने की हिम्मत कर सकीं। इनमें से एक लेसबियन और बॉयोसैक्सुअल थीं।

दोनों का सामने आना बड़ी बात हैं, मगर उनके मुकाबले गे पुरुषों की संख्या कई गुना  ज्यादा थी। यह दिखाता है कि गे के मुकाबले लेसबियन ज्यादा असुरक्षित और डरा हुआ महसूस करती हैं। इसका एक कारण एशले समाज द्वारा लेसबियन महिला या युवती के चरित्र ही दाग लगाए जाने को भी मानते हैं। उनके अनुसार लेसबियन  को सीधे-सीधे कामुकता से जोड़ दिया जाता हैं।

 


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