अंधेरे में इंसाफ तो फिर कैसी दीवाली?

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Tuesday, October 29, 2013-2:07 PM

नई दिल्ली/ मुजफ्फरनगर (हर्ष कुमार सिंह): अखिलेश सरकार को हिलाकर रख देने वाले मुजफ्फरनगर दंगे का जख्म अभी हरा है। जहां एक ओर पटना में हुए सीरियल बम ब्लास्ट से इन दंगों से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं ये दंगे वेस्ट यू.पी. के इस समृद्ध जिले के लिए एक बदनुमा दाग बन गए हैं।

दंगों की त्रासदी झेलने वाले मुजफ्फरनगर के ग्रामीणों ने इस बार दीवाली नहीं मनाने का एेलान किया है। यह एेलान उन गांवों से सबसे ज्यादा हुआ जहां के लोग साइलैंट वायलैंस में मारे गए थे। 7 सितम्बर को शुरू हुए इन दंगों में हिंदू और मुसलमान, दोनों पक्ष के लोग मारे गए थे। हालांकि अखिलेश सरकार ने 17 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में रखे पक्ष में 46 मुस्लिम और 16 हिंदू के मारे जाने की बात स्वीकारी।

दंगों के बाद ग्रामीण इलाकों में जहां सांप्रदायिक सौहार्द पूरी तरह से खत्म हो गया है वहीं, दंगों के दौरान वोट की राजनीति के चलते अखिलेश सरकार की जबर्दस्त लापरवाही उजागर हुई और अधिकांश मामलों में तुष्टिकरण होता नजर आ रहा है।

नंगला मंदौड़ की महापंचायत से लौट रहे ग्रामीणों पर जिस तरह से घात लगाकर विदेशी हथियारों से गोलियां बरसाईं गई थी तब उसकी प्रतिक्रिया में ये दंगे हुए थे। जाट बहुल गांवों में अल्पसंख्यकों के साथ ङ्क्षहसा हुई और

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