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अब विश्वास की इमारत खड़ी करने की कवायद

  • अब विश्वास की इमारत खड़ी करने की कवायद
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Thursday, October 31, 2013-3:06 PM

नई दिल्ली / मुजफ्फरनगर (हर्ष कुमार सिंह): मुजफ्फरनगर दंगों ने जहां वेस्ट यू.पी. में सांप्रदायिक भाईचारे का संकट खड़ा कर दिया है वहीं ये तथ्य भी सामने आया है कि पुनर्वास और राहत के मामले में सरकारी प्रयासों से ज्यादा सामुदायिक प्रयास ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं। इसकी जीती जागती मिसाल उन गांवों में देखी जा सकती है जहां पर दंगा पीड़ितों के लिए फिर से नए सिरे से घर बनाए जा रहे हैं और इसके लिए किसी सरकारी सहायता का मुंह नहीं तका जा रहा है।

जाट बहुल इलाकों में कई गांव ऐसे हैं जहां पर ग्रामीण निजी प्रयासों से दंगा पीड़ितों के लिए राहत का काम कर रहे हैं। अभी पुनर्वास और राहत की पहल हुई है और ये पहला ही कदम है। विश्वास की कमी से खोखली हुई जमीन पर भरोसे की इमारत खड़ी करना इतना आसान नहीं होगा।  मुजफ्फरनगर दंगे में इस इलाके की ऐसी 2 कौमों के बीच आपसी सौहार्द कम हुआ है जो इस क्षेत्र के 2 ताकतवर बाजुएं कही जाती हैं। वेस्ट यू.पी. में जहां जाट बिरादरी खेती करने वाली काम है वहीं, मुसलमान यहां कारीगर और अन्य ऐसे ही तकनीकी कार्यों में अपनी अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

इन दंगों का सबसे प्रत्यक्ष  प्रभाव ये हुआ है कि अभी तक वेस्ट यू.पी. में कोल्हू पूरी तरह से शुरू नहीं हो सके हैं। इसका प्रमुख कारण ये है कि कोल्हू पर काम करने वाले कारीगरों में मुस्लिमों की संख्या कम नहीं है। ये कारीगर पलायन कर गए हैं और पंजाब, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में काम करने के लिए रवाना हो गए हैं। इसके अलावा सांप्रदायिक तनाव के चलते ग्रामीण इलाकों में कोल्हू लगाने की हिम्मत भी लोग जुटा नहीं पा रहे हैं अन्यथा रात-दिन कोल्हू चला करते हैं।

फेडरेशन आफ गुड़ टै्रडर्स के अध्यक्ष अरुण खंडेलवाल के अनुसार जहां इन दिनों हर साल गुड़ की आमद 8 हजार मन रोजाना हो जाया करती थी वहीं, अब ये एक हजार तक सिमटकर रह गई है। इसका सीधा सा अर्थ ये निकल रहा है कि पूरा इलाका कारोबारी दृष्टि से बहुत ही प्रभावित हुआ है। ऐसे में जाट बहुल इलाकों में पुनर्वास के काम के लिए बिरादरी के लोगों को आगे ही आना पड़ रहा है। फुगाना गांव में जहां लगभग 50 घरों को जलाकर राख कर दिया गया था वहां ग्रामीणों ने शांति समिति बनाकर पुनर्वास का काम शुरू करवाया है। इन लोगों ने उन लोगों से टैलीफोनिक संपर्क साधा है जो गांव छोड़कर चले गए हैं।

 

 

Edited by:Jeta
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