मां लक्ष्मी को गढऩे वाले कुम्हारों से कोसो दूर है लक्ष्मी

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Friday, November 01, 2013-4:25 PM

दरभंगाः दीपों के पर्व दीपावली का इंतजार पूरे साल सभी को रहता है खासकर बच्चों एवं युवाओं में इसे लेकर गजब का  जोश रहता है लेकिन कुम्हारों के लिये यह मात्र पर्व न होकर जीवन यापन का एक बड़ा जरिया है और अजीब विडंबना है कि मां लक्ष्मी को गढऩे वालों से ही यह कोसों दूर हैं।

आधुनिकता एवं किरोसिन की अनुपलब्धता की मार दीपावली में घर-घर प्रकाश से जगमगा देने वाले दीप. कुलिया बनाने वाले कुम्हारों के उपर भी पड़ा है जिस कारण दीप बनाने वाले स्वयं दीप जलाने से वंचित रह जाते है और उनके घर पर अंधेरा ही रहता है।  इसे विडंबना नही तो और क्या कहा जाये कि दीपावली पर घरों में जिस लक्ष्मी-गणेश की पूजा, लक्ष्मी के आगमन के लिये करते है उसे गढऩे वालों कुम्हारों से ही वह कोसों दूर रहती है। 
 
पूजा आदि के आयोजनों पर प्रसाद वितरण के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी का कुल्हड़ एवं भोज में पानी के लिये मिट्टी के ग्लास आदि भी प्रचलन में नही रह गये है। इसकी जगह अब प्लास्टिक ने ले ली है। वही पारम्परिक दीप की जगह मोमबत्ती एवं बिजली के झाड़-फानुस ने ले ली है।  इस कारण भी कुम्हारों की जिन्दगी में दिन प्रतिदिन अंधेरा होती जा रही है और वे अपनी पैतृक कला एवं व्यवसाय से विमुख हो रहे है।
 


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