हरियाणा में बढ़ रहे हैं महिलाओं के प्रति अपराध

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Monday, November 04, 2013-4:15 PM

पिछले महीने पंजाब विश्वविद्यालय स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ लीगल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफैसर और सीनेट डा. अजय रंगा ने पंजाब और हरियाणा में औरतों के साथ होने वाले अपराधों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद नतीजा निकाला कि पंजाब के मुकाबले हरियाणा में महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के बजाय बढ़ रहे हैं।

इसके लिए उन्होंने हरियाणा सरकार के  ढुलमुल रवैये को जिम्मेदार माना है। मसलन वह खाप पंचायतों पर कार्रवाई नहीं करती, महिला आयोग के पास राष्ट्रीय स्तर पर भी सजा का अधिकार नहीं है, जनता व पुलिस के बीच संबंध अच्छे नहीं हैं। पंजाब में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या में कमी का कारण वहां आप्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या और शिक्षित महिला वर्ग है। सिख धर्म की भी इसमें काफी बड़ी भूमिका है।

डा. रंगा ने हरियाणा की महिलाओं की खराब स्थिति के लिए जिन मूल कारणों को जिम्मेदार ठहराया वे उचित लगते हैं। हरियाणा में महिलाओं में अशिक्षा और अज्ञानता एक बहुत बड़ा ऐसा कारण है जिसकी वजह से उनको पता ही नहीं है कि वे अपने हित व सुरक्षा के लिए कानून का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। यही अज्ञानता उन्हें परम्पराओं के बंधन में भी जकड़े रखती हैं जिसमें बंधी रह कर वे सिसक तो सकती हैं लेकिन उन्हें तोड़ नहीं सकतीं।


हरियाणा का रूढि़वादी समाज ही प्रदेश में नेता भी पैदा करता है और अफसर भी। ऐसे में यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि ये अफसर और नेता महिलाओं की स्थिति सुधारने में कोई योगदान दे सकते हैं। उपरोक्त दोनों वर्गों में से अभी तक कोई भी ऐसा शख्स सामने नहीं आया जिसने खुल कर खाप पंचायतों के खिलाफ कुछ बोला हो, कार्रवाई करना तो बहुत दूर की बात है। हां, इनके पक्ष में बोलने वाले हजारों मौजूद हैं।

हरियाणा की रूढि़वादिता के उलट पंजाब में सिख धर्म ने महिलाओं की स्थिति को जिस प्रकार से परिभाषित किया उसने समस्त सिख समाज को महिलाओं के प्रति सहनशील, उदारवादी और प्रगतिशील व्यवहार अपनाने के लिए बाध्य किया। पारम्परिक हरियाणवी परिवारों में जहां बचपन से ही बच्चों के निष्कलंक मानस पर ङ्क्षलगभेद की लकीरें खींच दी जाती हैं, वहीं सिख परिवार के बच्चे आमतौर पर इस बुराई से अछूते रहते हैं। नतीजा है कि दोनों किस्म के परिवारों के बच्चे महिलाओं के प्रति अलग-अलग नजरिया लेकर बड़े होते हैं। एक ओर जहां महिला के प्रति दासी और भोग्या का व्यवहार पनपता है तो वहीं दूसरी ओर समानता की प्रवृत्ति पैदा होती है। इन्हीं नजरियों का परिणाम है कि हरियाणा में पंजाब के मुकाबले महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या भी काफी अधिक है।


डा. रंगा ने अपराधों के जो आंकड़े जमा किए हैं वे दोनों राज्यों के बीच अपराधों की स्थिति को उजागर करते हैं। वर्ष 2008 में पंजाब में दुष्कर्म के 517 केस दर्ज किए गए जबकि हरियाणा में 631, वर्ष 2009 में पंजाब में 511 मामले दर्ज हुए तो हरियाणा में यह संख्या 603 थी। अगले वर्ष में पंजाब में 546, हरियाणा में 720, वर्ष 2011 में पंजाब में 479 और हरियाणा में 733 जबकि वर्ष 2012 में दोनों ही राज्यों में यह संख्या 668 थी।

इसी प्रकार दहेज हत्या और महिलाओं से दुव्र्यवहार की घटनाएं भी हरियाणा में अधिक पाई गईं। वर्ष 2008 से 2012 के बीच पंजाब में लड़कियों के अपहरण और घर से भगा ले जाने की घटनाओं की संख्या 2809 थी जबकि हरियाणा में यह 3650 थी। पंजाब में दहेज के कारण 726 मौतें हुईं, वहीं हरियाणा में इसकी दोगुनी के लगभग यानी 1380 महिलाएं दहेज के दानव की भेंट चढ़ा दी गईं।

वर्ष 2008 से 2011 के बीच ससुराल में महिलाओं से दुव्र्यवहार के  पंजाब में 5637 केस हुए जबकि हरियाणा में 13,649, यानी दोगुने से भी अधिक। उपरोक्त आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि महिलाओं का सशक्तिकरण सही मायनों में शिक्षा के जरिए ही हो सकता है। साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि स्कूलों व परिवारों में शुरू से ही बच्चों में महिलाओं के प्रति सहिष्णुता और बराबरी का नजरिया पैदा किया जाए।
 


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