'मंगलयान' ने भरी उड़ान, ISRO ने लॉन्च किया मार्स ऑर्बिटर मिशन

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Tuesday, November 05, 2013-9:45 PM

नई दिल्ली: भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाते हुये आज आंध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से दोपहर बाद दो बजकर 38 मिनट पर अपना 'मंगलयान' प्रक्षेपित किया। मंगलयान के प्रक्षेपण के साथ ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 'मंगलयान' लांच करने वाली दुनिया की चौथी एजेंसी बन गया है।

इससे पहले अमेरिका, रूस, जापान, चीन और यूरोपीय संघ ने ही दूसरे ग्रहों पर यान भेजा है। प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी25 ने जैसे ही लांच पैड से उडान भरी, नियंत्रण केंद्र में मौजूद सभी वैज्ञानिकों के चेहरे खिल उठे। चालीस मिनट की उड़ान के बाद यान को धरती की कक्षा में स्थापित कर दिया जायेगा,

जहां 01 दिसंबर तक चक्कर लगाने के बाद इसे मंगल की ओर रवाना किया जायेगा। यान पर पांच उपकरण लगाये गये हैं. जो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा मंगलयान की आरंभिक यात्रा की निगरानी में इसरो की मदद करेगा। बाद में इसरो का डीप स्पेस नेटवर्क स्टेशन. (आईडीएसएन) यान की आगे की यात्रा को पूरी तरह नियंत्रित करेगा। तीन सौ दिन की यात्रा के बाद मंगलयान 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा। मंगलयान के साथ भेजे जा रहे पांच उपकरण मंगल पर मीथेन और ड्यूटेरियम के अलावा जीवन और पानी के निशान की भी खोज  करेंगे।

मिशन के लिए PSLV-C25 का इस्तेमाल किया गया है यानी ये PSLV का 25वां मिशन है। PSLV-C25 की ऊंचाई 45 मीटर है। जिस उपग्रह को मंगल की कक्षा में स्थापित किया जाएगा उसका नाम है मार्स ऑर्बिटर। 1337 किलो वजन वाले मार्स ऑबिटर सैटेलाइट को लेकर PSLV- C-25 अंतरिक्ष में गया है।

रॉकेट नैनो कार के बराबर के इस 'मंगलयान' को अंतरिक्ष में छोड़ा गया। वैज्ञानिकों के पास इस अभियान की तैयारी के लिए सिर्फ 15 महीने का वक्त था क्योंकि अगला मौका 780 दिन के बाद जनवरी 2016 में ही मिल सकता था। इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन के मुताबिक मंगल को रहने योग्य माना जाता है।

कई प्रकार से यह धरती जैसा ही है। उन्होंने बताया कि धरती के लगभग समान मंगल भी अपनी धुरी पर 24 घंटे 37 मिनट में एक घुर्णन लगाती है। हालांकि धरती जहां 365 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है, वहीं मंगल को इसमें 687 दिन लगते हैं। गौरतलब है कि इसरो के इस अभियान पर 450 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।

ऑर्बिटर को मंगल की कक्षा में पहुंचने में नौ महीने लगेंगे। अब तक चलाए गए 51 मंगल अभियानों में 21 ही सफल रहे हैं। अंतरिक्ष कार्यक्रम 1960 से ही इसरो के अभियानों का हिस्सा रहा है। ज्ञात हो कि चंद्रयान-1 अभियान में ही पहली बार चांद पर पानी का पता चला था। अभी ऑर्बिटर धरती की कक्षा में ही चक्कर लगाएगा। एक दिसंबर को इसे अंतरिक्ष में मंगल की ओर बढ़ाया जाएगा।


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