जहां भाई दूज के दिन होती है ‘भेजा दिवाली’

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Thursday, November 07, 2013-4:22 PM

रायपुर: छत्तीसगढ़ के नवगठित बालोद जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां दिवाली पर्व दो दिन बाद मनाया जाता है। जिले के गुरुर विकासखंड के भेजा मैदानी गांव में मंगलवार को भाई दूज के दिन धूमधाम से दिवाली मनाया जा रहा है। आसपास के लोग इसे ‘भेजा दिवाली’ के नाम से जानते हैं। यहां मेले जैसे माहौल में दिवाली मनाई जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते हैं। यूं तो इस पौराणिक परंपरा के बारे में गांव के लोगों को भी ठीक से मालूम नहीं है कि कब से गांव में दो दिन बाद दिवाली मनाई जा रही है, पर इस गांव की दिवाली का अलग ही महत्व है।

 

बालोद जिला मुख्यालय से 32 किलोमीटर एवं धमतरी जिला मुख्यालय से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव भेजा मैदानी की जनसंख्या लगभग दो हजार है। जैसा नाम, वैसा ही यह गांव है। गांव में चारों ओर मैदान ही मैदान है। शायद इसलिए इस गांव को भेजा मैदानी कहा जाता है। यहां हिंदू व मुस्लिम, दोनों वर्ग के लोग निवास करते हैं। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल इस गांव में लगभग सभी वर्ग व जाति के लोग निवास करते हैं और उनमें भाईचारे की भावना दिखती है।

 

यहां हर त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन दिवाली दो दिन बाद मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। जहां सब लोग दीपावली का त्योहार मना रहे होते हैं, उस दिन भेजा में लक्ष्मी पूजा व गौरा-गौरी की पूजा होती है। भाई दूज के दिन दीपावली का त्योहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है और इसे ही लोग भेजा दिवाली के नाम से जानते हैं। यहां इस दिन गांव में मेला का आयोजन कर विविध कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिसमें आस-पास के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

 

पूरे क्षेत्र में व्यवसाय की दृष्टि से संपन्न इस गांव में लोग कृषि के साथ ही साथ पशुपालन, मुर्गीपालन एवं अन्य व्यवसाय से जुड़े हैं। उप-सरपंच देव प्रसाद यादव, पंच मोहम्मद अली खान, उदयराम साहू और खोरबाहरा राम साहू ने बताया कि पूर्वजों के अनुसार, भेजा मैदानी जमींदार का गांव था और जमींदार जब अन्य गांव से दिवाली मनाकर दूसरे दिन यहां आता था,

 

तब उस दिन यहां शाम को लक्ष्मी पूजा एवं गौरा-गौरी की पूजा होती थी और उसके अगले दिन यानी भाई दूज के दिन दिवाली हर्षोल्लास से मनाई जाती थी। अब जमींदारी प्रथा हालांकि खत्म हो गई है, लेकिन यह इस गांव की परंपरा बन गई है। तब से आज तक ग्रामीण अपने गांव की इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं।


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