कांग्रेस ने नेहरू पर आडवाणी के दावे को लेकर संदेह प्रकट किया

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Thursday, November 07, 2013-2:26 PM

नई दिल्ली: कांग्रेस ने आज भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के उस दावे पर शंका जाहिर की जिसमें उन्होंने एक पुस्तक का हवाला देते हुए कहा था कि देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद जब भारत में हैदराबाद के विलय के लिए सेना भेजने का सुझाव दिया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पटेल को ‘पूर्णयत साम्प्रदायिक’ व्यक्ति कहा था। आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर पांच नवम्बर को 1947 बैच के आईएएस अधिकारी एम. के. के. नायर की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ एन एरा टोल्ड विदआउट इल विल’’ का उद्धरण दिया। इस किताब में हैदराबाद के खिलाफ ‘पुलिस कार्रवाई’ से पहले हुई कैबिनेट की बैठक में नेहरू और पटेल के बीच हुए ‘तीखे वार्तालाप’ का जिक्र किया गया है। मलयालम में लिखित यह पुस्तक अंग्रेजी में अनुवाद की प्रक्रिया में है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भाजपा नेता द्वारा पेश उक्त सामग्री पर संदेह जाहिर करते हुए ट्वीटर पर अपनी टिप्पणी में आडवाणी से सवाल करते हुए कहा कि आईएएस की स्थापना 1946 में हुई थी। अगर नायर ने 1947 में ज्वाइन किया तो क्या उस स्तर के अधिकारी को 1948 में कैबिनेट की गोपनीय चर्चाओं की जानकारी हो सकती थी। नायर समुदाय के प्रमुख व्यक्तियों के बारे में जानकारी देने वाली एक वेबसाइट का उल्लेख करते हुए तिवारी ने कहा कि एक एमकेके नायर 1950 में आईएएस में शामिल हुए थे जबकि हैदराबाद पुलिस कार्रवाई 1948 में हुई थी। तिवारी ने लिखा, ‘‘एक एमकेके नायर 29 दिसम्बर 1930 में पैदा हुए थे और 1950 में आईएएस में शामिल हुए थे। हैदराबाद पुलिस कार्रवाई 1948 में हुई थी। अगर वही एमकेके नायर हैं तो तथ्य मेल नहीं खाते। भाजपा कुछ समय से सरदार पटेल को हिन्दुत्व की विचारधारा के करीब बताने का प्रयास कर रही है।

31 अक्तूबर को पटेल की जन्म तिथि के मौके पर गुजरात में उनकी विशाल प्रतिमा के निर्माण की परियोजना की आधारशिला रखी गयी थी। उस कार्यक्रम में आडवाणी ने पटेल की प्रशंसा की थी। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत को पटेल की धर्मनिरपेक्षता की जरूरत है न कि वोट बैंक की धमनिरपेक्षता की।  कांग्रेस महासचिव शकील अहमद ने भी नाम लिये बगैर आडवाणी की टिप्पणी की आलोचना की। उन्होंने ट्वीटर पर अपनी टिप्पणी में कहा, ‘‘अत्यंत खेदजनक। कुछ नेता अपने निहित स्वार्थ के लिए यह साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि सरदार पटेल धर्मनिरपेक्ष नहीं थे, बल्कि उनकी तरह सांप्रदायिक थे।’’


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