‘तिल का ताड़’ बना मोदी की एस.पी.जी. सुरक्षा का मुद्दा

  • ‘तिल का ताड़’ बना मोदी की एस.पी.जी. सुरक्षा का मुद्दा
You Are HereNational
Tuesday, November 12, 2013-3:26 PM

तिल का ताड़ बनाना। खुली चुनावी दंगल में तुच्छ बातों पर भी गंदली तू-तू, मैं-मैं हो जाती है। कांग्रेस की बचकानी हरकतों और भाजपा के अनुदार आचरण पर यह तू-तू, मैं-मैं जारी है। इसका मुख्य कारण नमो को इस हास्यास्पद दलील के आधार पर एस.पी.जी. सुरक्षा देने की मांग अस्वीकार करना है कि एस.पी.जी. एक्ट केवल प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्रियों, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और नाती-पोतों सहित उनके परिवार के सदस्यों पर लागू होता है।

प्रश्न उठता है जब विभिन्न आतंकवादी संगठनों से खतरे का सामना कर रहे मोदी को जैड प्लस एन.एस.जी. सुरक्षा प्राप्त है तो फिर एस.पी.जी. सुरक्षा लेने के लिए इतना हल्ला क्यों? उनकी रक्षा के लिए क्या एन.एस.जी. के 108 कमांडो पर्याप्त नहीं हैं या क्या एस.पी.जी. सुरक्षा का तात्पर्य विशेष प्रतिष्ठा है? भाजपा की इस बात में दम है कि यदि कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को एक निजी व्यक्ति के रूप में एस.पी.जी. की सुरक्षा प्राप्त है और वे देश के उन चुनिंदा वी.वी.आई.पी. में से एक हैं जिनकी देश के किसी भी हवाई अड्डे  पर सुरक्षा जांच नहीं है तो फिर मोदी को ऐसी सुरक्षा देने में क्या गलत है क्योंकि आखिरकार वह हैं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार।

मोदी को एन.एस.जी. की बजाय एस.पी.जी. सुरक्षा देने से परोक्ष रूप से उनका प्रोफाइल बढ़ जाएगा। यह उनकी और भाजपा की मनोवैज्ञानिक जीत होगी किन्तु कांग्रेस हर कीमत पर इसे रोकना चाहती है। किन्तु मुद्दा मोदी को एस.पी.जी. सुरक्षा देने या न देने का नहीं है। यह संपूर्ण राजनीतिक तंत्र का है। आधिकारिक धनिक तंत्र, चोर तंत्र और सत्ता तंत्र में सभी प्रकार के नेता छोटे-बड़े क्षेत्रीय-राष्ट्रीय और धर्मनिरपेक्ष-सांप्रदायिक सभी करदाताओं की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपयों से बड़े-बड़े सुरक्षा तामझाम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

क्या वे वास्तव में इस अतिरिक्त महत्व के हकदार हैं? बिल्कुल नहीं। जरा गौर कीजिए। 3500 जवानों के एस.पी.जी. बल ने 2004 से गांधी परिवार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की सुरक्षा पर 1800 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और 400 से अधिक वी.आई.पी. की रक्षा पर प्रतिवर्ष केवल 450 करोड़ रुपए खर्च हुए जबकि 120 करोड़ से अधिक की जनसंख्या को आतंकवाद से बचाने पर केवल 158 करोड़ रुपए खर्च किए गए।

हैरानी की बात यह है कि ऐसे देश में 50 प्रतिशत से अधिक पुलिस बल को 2500 से अधिक वी.आई.पी. की सुरक्षा में तैनात किया जाता है जहां पर प्रति व्यक्ति पुलिस अनुपात दुनिया में सबसे कम है अर्थात 1  लाख लोगों पर 10 सशस्त्र पुलिसकर्मी। यही नहीं, एक बार सत्ता में आने पर प्रतिष्ठा और शैली महत्वपूर्ण बन जाती है। अकेले दिल्ली में 14200 पुलिस के जवान वी.आई.पी. की सुरक्षा में तैनात हैं। शीर्ष स्तर पर एस.पी.जी., फिर एन.एस.जी. के  6 ब्लैक कैट कमांडो, 2 हैड कांस्टेबल, 12 कांस्टेबल, एक लाल बत्ती वाली पायलट कार सहित कारों का काफिला। ब्लैक कैट कमांडो के पास ए.के. 47 भी होती है।

उसके बाद जैड श्रेणी की सुरक्षा में 68 वी.आई.पी., वाई श्रेणी में 243 वी.आई.पी. और एक्स श्रेणी में 81 वी.आई.पी. हैं। स्वतंत्र भारत के नए महाराजाओं को सलाम। हमारे नेता ए.के. 47 धारी सुरक्षा कर्मियों की मांग करते हैं और यदि उन्हें वापस लिया जाता है तो शोर मचाते हैं। विसंगति देखिए जिन वी.आई.पी. को कोई खतरा नहीं है उन्हें भी दिन-रात 4 व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी दिए जाते हैं। इसका अंत यहीं नहीं होता है। बजट सत्र के दौरान वी.आई.पी. सुरक्षा के लिए लोकसभा में शोर-शराबा सुनने को मिला। सांसदों ने उनकी सुरक्षा कम करने का विरोध किया। ये सांसद उस जनता से सुरक्षा चाहते हैं जिसकी रक्षा करने का वे दावा करते हैं।

आज हम ऐसे भारत में रह रहे हैं जहां पर केवल वी.आई.पी. ही महत्वपूर्ण हैं। हमारे यहां 2 तरह के कानून हैं - जनता के लिए कानून का शासन और नेताओं के लिए कानून द्वारा शासन। नेताओं के लिए ‘किसी भी नियम का पालन न करना’ मुख्य है। सुरक्षा कर्मियों के साथ लालबत्ती की गाड़ी में वे रैड लाइट जंप कर देते हैं और दुर्घटना करते हैं। यह सब कुछ अपना दबदबा दिखाने के लिए है और यदि कोई उनके इन कारनामों पर प्रश्न उठाता है तो उसे उनके कोप का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

हमारे नेताओं की सुरक्षा के लिए संसद में 108 करोड़ रुपए के सुरक्षा उपकरण लगाए गए हैं। आज संसद एक अभेद्य दुर्ग बन गया है -आतंकवादियों के लिए नहीं अपितु उन नागरिकों के लिए जिन्होंने जन सेवकों को चुना है। हालांकि संसद में कुछ अपराधी भी विराजमान हैं। यह भी एक त्रासदी है कि देश 21वीं सदी में पहुंच चुका है। हमारे सत्तारूढ़ राजा 19वीं सदी में जी रहे हैं। सामंती कुलीन तंत्र, औपनिवेशिक सोच और अहंकार के चलते हमारे नेता अधिक सुरक्षा से स्वयं को जनता के बढ़ते गुस्से से बचाते हैं जिसके कारण आम आदमी और खास आदमी में अन्तर बढ़ गया है।

फलत: नेताओं से लोगों का संपर्क टूट गया है और वे उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं।  केवल हमारे जैसा गरीब देश ही ऐरा-गैरा नेताओं को भी सुरक्षा उपलब्ध कराता है जबकि अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में कुछ ही नेताओं को सुरक्षा दी जाती है। समय आ गया है कि हमारे नेता इस बात को समझें कि विशेषाधिकारों में वृद्घि के साथ जवाबदेही भी बढ़ती है। आज उन्हें उस हर समस्या का प्रतीक माना जाता है जो भारत के समक्ष है। जो सरकार केवल अपनी सुरक्षा करती है वह कंकाल समान है जो इस कंकाल के नष्ट होने पर शीघ्र गिर जाती है।


विवाह प्रस्ताव की तलाश कर रहे हैं ? भारत मैट्रीमोनी में  निःशुल्क  रजिस्टर  करें !

Recommended For You