सबूतों की संख्या से नहीं तय होती सजा

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Friday, November 15, 2013-11:45 AM

नई दिल्ली (मनीषा खत्री): दिल्ली उच्च न्यायालय ने सबूतों की संख्या को तवज्जो न देते हुए हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए तीन आरोपियों को राहत दे दी है। अदालत का कहना है कि  लीगल सिस्टम इस पर जोर डालता है कि हर गवाह ने कितने विश्वसनीय सबूत दिए हैं, न कि कितने गवाह पेश किए गए हैं। ऐसे में साफ है कि किसी मामले में सबूतों की गुणवत्ता को महत्व दिया जाता है कि न कि उनकी संख्या को।

न्यायमूर्ति जी.एस. सिस्तानी व न्यायमूर्ति जी.पी.मित्तल की खंडपीठ  ने आरोपी देवेंद्र सिंह, राकेश कुमार चौधरी व रमेश सिंह बिष्ट इन तीनों आरोपियों को हत्या के मामले में बरी करते हुए मारपीट करने के मामले में दोषी करार दिया है। खंडपीठ ने इनको एक-एक साल कैद की सजा दी है।

खंडपीठ ने कहा कि सभी आरोपी लगभग 6-6 साल पहले ही जेल में बिता चुके हैं। ऐेसे में वह उनको मिली सजा से ज्यादा सजा पहले ही काट चुके हैं, इसलिए अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उनको रिहा कर दिया जाए। खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी करार देते समय गलती की है।

उन सबूतों को सजा का आधार बना दिया गया जो एविडेंस एक्ट के तहत मान्य ही नहीं थे। खंडपीठ ने कहा कि इन सभी आरोपियों ने पीड़ित से मारपीट की थी परंतु ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह जाहिर हो कि इन्होंने उसका गला दबाया था या उसकी बॉडी को रेलवे ट्रक के पास फेंक दिया था। ऐसे में इन सभी को मारपीट करने के मामले में ही दोषी करार दिया जा सकता है।

निचली अदालत ने तीनों आरोपियों को 24 मार्च 2012 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में 2 आरोपी अभी तक फरार हैं। इसी आदेश को इन्होंने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। पुलिस के अनुसार 9 फरवरी 2008 को उनको समयपुर बादली इलाके में रेलवे ट्रक के पास एक व्यक्ति की लाश मिली थी। जांच के दौरान पुलिस को एक राजू कुमार नामक लड़का मिला। उसने बताया कि वह रमेश सिंह बिष्ट के यहां पर वेटर का काम करता था।


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