चुनाव में दलबदलुओं की पौ बारह

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Wednesday, November 20, 2013-12:48 PM

नई दिल्ली (सज्जन चौधरी): जनता की भावनाओं का कोई मोल नहीं है। इन्हें बस सत्ता की कुर्सी चाहिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव ऐसे दलबदलू नेताओं से भरा पड़ा है, जिन्हें सिर्फ सत्ता का सुख भोगने से मतलब है, फिर चाहे किसी भी पार्टी का साथ मिले। भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा से लेकर तमाम छोटे-बड़े दलों के नेताओं ने सत्ता के लालच में अपनी पार्टी छोड़, किसी जमाने में सबसे बड़ी दुश्मन रही पार्टी का दामन थाम लिया है।

हरशरण सिंह बल्ली : हरिनगर से लगातार 4 बार के भाजपा विधायक बल्ली को टिकट नहीं मिला तो उन्होंने कांगे्रस का दामन थामने में जरा भी देर नहीं की। जिस पार्टी से राजनीतिक करियर शुरू हुआ, एक बार उस पार्टी के लिए त्याग करने की बारी आई तो उन्होंने पार्टी छोडऩे का ही फैसला कर लिया। भाजपा ने हरिनगर सीट अकाली दल को देने का फैसला किया तो बल्ली को यह नागवार गुजरा और उन्होंने भाजपा के खिलाफ उतरने की ठान ली और अब कांग्रेस के टिकट पर हरिनगर से चुनाव लड़ रहे हैं। विजेंद्र गर्ग : राजेंद्र नगर से विधानसभा टिकट मांग रहे विजेंद्र गर्ग ने टिकट न मिलता देख कांगे्रस छोड़कर आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर ली। अन्ना के आंदोलन से लेकर पार्टी के गठन तक आम आदमी पार्टी कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मनों में से एक है। किसी समय जमकर अरविंद केजरीवाल के साथ खिलाफ भड़ास निकालने वाले विजेंद्र गर्ग आज केजरीवाल की तारीफ करते थकते नहीं हैं। शायद इन्हीं तारीफों का असर है कि कांग्रेस छोडऩे के महज 4 दिन बाद इन्हें आम आदमी पार्टी से टिकट मिल गया।


जगदीश प्रधान : मुस्तफाबाद से भाजपा प्रत्याशी जगदीश प्रधान कांग्रेस के पूर्व पार्षद हैं। मुस्तफाबाद से टिकट न मिलता देख ये भाजपा से जुड़े और इलाके में गुर्जरों की अच्छी खासी संख्या देखते हुए पार्टी ने इन्हें टिकट भी दे दिया। किसी समय भाजपा को चोरों की पार्टी कहने वाले प्रधान जी के सुर टिकट मिलते ही बदल गए। उनके लिए अब कांग्रेस सबसे भ्रष्ट और चोरों की पार्टी है। अब उनके लिए हर्षवर्धन और विजय गोयल से अच्छा नेता कोई और नहीं लगता।

श्याम शर्मा : हरिनगर सीट से हरशरण सिंह बल्ली का पत्ता काटने के चक्कर में श्याम शर्मा ने भाजपा छोड़कर अकाली दल का हाथ थामा। ऐसा लगा जैसे पार्टी सदा से इन्हें ही टिकट देना चाहती थी, इसीलिए हरिनगर सीट को अकालियों के हवाले किया गया।

डॉ. वी.के. मोंगा  : जिस डॉक्टर ने राजनीति में चलना सीखाया, उसी का टिकट नहीं काट पाए तो दूसरी पार्टी ज्वाइन कर ली। भाजपा से 3 बार के पार्षद डॉ. वी.के. मोंगा को राजनीति में बढ़ाने के पीछे डॉ. हर्षवर्धन का हाथ था लेकिन हर्षवर्धन का टिकट नहीं काट पाए तो कांग्रेस से हाथ मिलाकर डॉ. हर्षवर्धन के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर गए।

त्रिलोक चौधरी : छतरपुर से टिकट की आस लगाए बैठे त्रिलोक चौधरी का नाम भी दलबदलूओं में शामिल हो गया है। लंबे समय तक कांगे्रस में सचिव के पद पर रहे त्रिलोक चौधरी ने इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सपोर्ट करने का फैसला किया है।

रामवीर विधूड़ी : पिछले चुनावों में नैशनलिस्ट कांगे्रस पार्टी के टिकट पर चुनाव हारने वाले रामवीर विधूड़ी ने राजनीतिक करियर की शुरूआत जनता दल यूनाइटैड से की थी। दिल्ली में जदयू का भविष्य न देखते हुए एन.सी.पी. के पल्ले से बंधे। फिलहाल रामवीर विधूड़ी भाजपा के टिकट से मैदान में हैं। इन्होंने एन.सी.पी. छोड़ी तो इनके साथ इनके 3 पार्षदों ने भी एन.सी.पी. छोड़ भाजपा से नाता जोड़ लिया है।




 


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