कांग्रेस का घोषणा-पत्र, जीतना सबसे जरूरी

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Thursday, November 21, 2013-12:50 PM

नई दिल्ली (ताहिर सिद्दीकी): कांग्रेस का घोषणा-पत्र सामने आने के बाद पार्टी की नीति और नियत का आकलन करने के लिए मतदाताओं को ठोस आधार मिल गया है लेकिन तरक्की के दूरगामी ढांचे की बजाए कांग्रेस ने तत्कालीन लाभ वाले मुद्दों पर अपना फोकस रखकर जता दिया है कि चुनाव जीतना उसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।

चौथी बार सरकार बनाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस अपने घोषणा-पत्र में आश्चर्यजनक रूप से जनता की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े विषयों पर मौन है। इसमें महंगी बिजली, बेलगाम महंगाई व भ्रष्टाचार जैसे विषय शामिल हैं। छात्रों को उच्च शिक्षा का सपना दिखाया गया है लेकिन दिल्ली के सभी छात्रों का राजधानी के कॉलेजों में दाखिला मिल सके इस पर घोषणापत्र ने चुप्पी साधे रखी है। हालांकि विपक्ष लम्बे समय से दिल्ली के छात्रों का दिल्ली के कॉलेजों में प्रवेश सुनिश्चित करने की मांग करता रहा है। कांग्रेस एक बार फिर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने को लेकर खामोश है।

पूर्ण राज्य की बजाय वह दिल्ली में सिंगल कमांड व्यवस्था लागू करने की वकालत कर रही है, जिसमें केंद्र सरकार के महत्व वाले विषयों को अलग रखने की बात की गई है। कांग्रेस ने अपनी घोषणाओं में मतदाताओं को लुभाने के लिए कई ऐसी योजनाओं की घोषणा की है, जिसे वह 1993 से करती आ रही है। झुग्गी की जगह गरीबों को फ्लैट बनाकर देने की योजना जैसी कई योजनाएं हैं, जिसकी घोषणा पिछले 20 वर्षों से कांग्रेस कर रही है।

कांग्रेस ने बिजली की दरों, बेलगाम महंगाई व भ्रष्टाचार जैसे जनता को चुभने वाले मामलों को राकने के लिए कोई विजन प्रस्तुत नहीं किया है। पार्टियां 5 साल के लिए वादे जरूर करती हैं लेकिन सत्ता में आने पर और इसे लागू करने पर इसका असर बरसों बाद तक पड़ता है। दिल्ली में मध्यम वर्ग के लिए बिजली की दरों व जरूरी चीजों की आसमान छूती कीमतों को काबू करने वाला विजन भी पेश होना जरूरी था लेकिन कांग्रेस ने ज्वलंत मुद्दों पर चुप्पी साधे रखना बेहतर समझा।

गत विधानसभा चुनावों के मौके पर घोषणा-पत्र में जो वादे किए गए थे, उसमें से 70 प्रतिशत वादे आज भी अधूरे हैं। चमचमाती सड़कों व चमचमाती मैट्रो की हसीन सुविधाएं जरूर पूरी हुई हैं लेकिन लाखों लोगों के सपने आज भी अधूरे हैं। 895 अवैध कॉलोनियों को वैध करने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन अब भी इन कॉलोनियों को वैध करने में कई पेंच हैं।

खुद इन इलाकों के विधायक स्वीकार करते हैं कि सरकार भले ही इन कॉलोनियों में करोड़ों रुपए खर्च कर विकास कार्य पूरे करवा रही हो लेकिन इन्हें वैध करने में अब भी कई पेंच हैं। दिल्ली को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की बात थी लेकिन यह सपना भी अधूरा है। सरकार के बिजली प्लांट निजी कंपनियों की ओर से गैस आपूर्ति नहीं होने के चलते अपनी पूरी क्षमता से बिजली की आपूर्ति नहीं कर रहे हैं।


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