मिजोरम चुनाव में महिला मतदाताओं की अहम भूमिका

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Sunday, November 24, 2013-6:31 PM

मिजोरम: मिजोरम में 25 नवंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की अहम भूमिका होगी। यह देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। 40 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 686,305 मतदाता वोट देने के पात्र हैं। इनमें महिला मतदाताओं की संख्या 349,506 और पुरुषों की 336,799 है।

वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से 6,644 अधिक थी। वहीं, वर्ष 2003 के चुनाव में यह संख्या 3,816 अधिक थी। पहाड़ी राज्य मिजोरम की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का अहम योगदान है। लेकिन आश्चर्य की बात यह कि इस बार यहां कुल 142 उम्मीदवारों में से केवल छह (चार प्रतिशत) महिलाएं हैं।

सत्तारूढ़ कांग्रेस और प्रमुख विपक्ष मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने एक-एक महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, जबकि तीन महिलाएं भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। वहीं, एक महिला स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही है। 2008 के चुनाव में चार महिला उम्मीदवार असफल रही थीं। मिजोरम के वर्ष 1972 में केंद्र शासित प्रदेश बनने और 1986 में एक पूर्ण विकसित राज्य बनने के बाद से यहां केवल तीन महिलाएं विधायक बनी हैं।

इनमें थानीमावी (1978), के. थानसियामी (1979) और लल्हिमपुई हमार (1987) शामिल हैं। इनमें से एमएनएफ की लल्हिमपुई हमार दिवंगत लालडेंगा की नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थीं। कुल 1,091,014 की अबादी वाले इस राज्य में 538,675 महिलाएं हैं। यहां पुरुष साक्षरता दर 93.72 है, जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 89.4 प्रतिशत है। महिला अधिकार कार्यकर्ता ललनीपुई ने कहा, ‘‘मिजो समाज में पूरी तरह पुरुष का वर्चस्व है। महिलाओं को हर किस्म के शासन में महत्व मिलना चाहिए।’’

वूमेन वेलफेयर फ्रंट (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की सचिव दारहमिंगथांगी ने आईएएनएस को बताया, ‘‘हम पूरी ताकत झोंक रहे हैं ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में अधिक से अधिक महिलाओं को देख सकें। हमने राजनीतिक दलों से  अधिक से अधिक महिला उम्मीदवारों को नामांकित करने का आग्रह किया है। हम महिला मतदाताओं से महिला उम्मीदवारों को वोट करने की अपील भी करेंगे।’’ वहीं, कांग्रेस नेता ललसावता ने कहा, ‘‘अगर महिलाएं योग्य एवं कुशल दावेदार हैं तो हमें उनके नामांकन से कोई परेशानी नहीं है।’’

समाजशास्त्री शुभांकर गोस्वामी ने आईएएनएस को बताया, ‘‘आधुनिक युग से पहले मिजो समाज एक चरम पितृसत्तामक समाज के रूप में जाना जाता था। इसलिए महिलाओं को घरेलू दायरे से बाहर जाने के अवसर नहीं थे। वे स्वतंत्र धार्मिक निष्ठा के बारे में सोचना तो दूर बल्कि पति के धर्म का पालन करने के लिए बाध्य थीं।’’


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