मतदान बढ़ेगा तभी मिलेंगे सही नेता

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Thursday, November 28, 2013-11:44 PM

नई दिल्ली (हर्ष कुमार सिंह): निर्वाचन आयोग चाहता है कि संसद या विधानसभा में आम जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधि सही मायने में उनकी आवाज बनें। यही वजह है कि मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। कहीं सैफ अली खान को बुलाया जा रहा है तो कहीं सोहा अली खान को ब्रांड अंबेसडर बनाया जा रहा है।

ऐसा क्यों होना जरूरी है? ये इसलिए कि कहीं 40-50 प्रतिशत वोटरों के बीच से ही जनप्रतिनिधि चुनकर सदन में न पहुंच जाए। दिल्ली की बात करें तो पिछली बार यहां 99 प्रतिशत विजेता प्रत्याशियों को 40 प्रतिशत (रजिस्टर्ड मतदाताओं के) से कम वोट मिले थे। संगम विहार से भाजपा के डॉ. एस सी एल गुप्ता तो सबसे कम यानी मात्र 27 प्रतिशत वोट लेकर ही जीते थे। पुराना सवाल है कि क्या सही मायने में वे जनप्रतिनिधि हैं?

सबसे पहले ये जान लेना जरूरी है कि मत प्रतिशत का आकलन कैसे किया जाता है। पूरा खेल प्रतिनिधित्व और वोट शेयर का है। प्रतिनिधित्व शब्द का मतलब निकालने के लिए विजेताओं को डाले गए कुल मतों को रजिस्टर्ड मतदाताओं से भाग (डिवाइड) कर दिए जाने से ये आंकडा निकाला जा सकता है।

जबकि वोट शेयर निकालने के लिए विजेताओं को पड़े कुल मतों को कुल पड़े वैध मतों से भाग देकर ये आंकड़ा निकाला जाएगा। इन दोनों ही बातों में बहुत बड़ा अंतर है।

उदाहरण के तौर पर पिछली बार 70 सीटों में से 47 विजेताओं को कुल पड़े मतों में से 50 प्रतिशत से कम मत  मिले थे। ओखला से कांग्रेस के परवेज हाशमी को केवल 14 प्रतिशत वोट मिले थे। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को खुद नई दिल्ली से 52 प्रतिशत वोट शेयर मिला था। और अगर सही मायने में जनप्रतिनिधित्व की बात करें तो शीला का ये आंकड़ा केवल 29 प्रतिशत तक ही सिमट जाता है।

विजेताओं में से गांधी नगर सीट से अरविंदर सिंह लवली कुल पंजीकृत वोटर्स का 41 प्रतिशत मत लेकर पूरी दिल्ली में पहले नंबर पर रहे थे। लवली वोट शेयर के हिसाब से नंबर वन पर थे और 64 प्रतिशत वोट लेकर वे इसके हकदार बने थे।
अगर पूरी दिल्ली की बात करें तो 70 सीटों के लिए औसत 58 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसमें 1 करोड़ 7 लाख, 22 हजार 979 पंजीकृत मतदाताओं में से केवल 28 लाख 4 हजार 587 ने विजेताओं के लिए मतदान किया था। जबकि 61.77 लाख मतदाताओं (58 प्रतिशत) ने वोट डाले थे।

इस लिहाज से जनप्रतिनिधित्व केवल 26 प्रतिशत निकलकर आता है और 99 प्रतिशत विजेताओं को केवल 40 प्रतिशत ही वोट मिले थे। ऐसे में किसी भी हिसाब से नहीं कहा जा सकता कि हमारे जनप्रतिनिधि सही मायने में हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं?
   


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