स्टार प्रचारक : शीला ने अकेले ही संभाल रखी है कमान

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Sunday, December 01, 2013-3:50 PM

नई दिल्ली (अशोक शर्मा):  विधानसभा चुनाव में दिल्ली सरकार और प्रदेश कांग्रेस के बीच जारी मनमुटाव अब खुलकर दिखाई देने लगा है। चुनाव में प्रचार के लिए केवल 3 दिन बचे हैं। दूसरी तरफ भाजपा के शीर्ष नेता जहां एक ओर छोटी-बड़ी सभाओं को ही सम्बोधित नहीं कर रहे हैं बल्कि गली-मोहल्लों तक जाकर मतदाताओं को प्रभावित कर रहे हैं।

इसके उलट कांग्रेस के सभी स्टार प्रचारक नदारद हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ही एकमात्र स्टार प्रचारक बनी हुई हैं। शीला रोजाना 6 सभाओं को सम्बोधित कर चुनावी वैतरणी को पार कराने में लगी हैं। कुछ दिन पहले कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों की एक बड़ी सूची तैयार की थी।

ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार का सारा जिम्मा दीक्षित का ही है और वह इस मामले में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करती हैं। कुछ का कहना है कि मुख्यमंत्री को इस बारे में पहले ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ सलाह-मशविरा करना चाहिए था, जो शायद वह नहीं कर सकीं। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और कृष्णा तीरथ प्रचार तो कर रहे हैं लेकिन वे केवल अपने संसदीय क्षेत्र तक ही सीमित हैं।

इसके अलावा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय माकन अपने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र में और रमेश कुमार दक्षिण दिल्ली में ही प्रचार कर रहे हैं। दिल्ली में पिछले 15 सालों के दौरान विकास के काम कराने के बावजूद कांग्रेस की चुनाव प्रचार में जो हवा बननी चाहिए थी वह फिलहाल कम ही जगहों पर दिखाई दे रही है।

दिल्ली चुनाव को सैमीफाइनल मानते हुए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा के पी.एम. इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की एक के बाद एक बड़ी चुनाव   सभाओं से माहौल देखते ही बन रहा है। यही नहीं पार्टी के अनेक बड़े नेता जैसे राजनाथ सिंह, अरुण जेतली, नितिन गडकरी,सुषमा स्वराज, शाहनवाज, मुख्तार अब्बास नकवी, स्मृति ईरानी, विनोद खन्ना और नवजोत सिंह सिद्धू आदि गली-मोहल्लों तक में पदयात्रा कर रहे हैं।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और फिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की चुनावी सभा होने के बाद ऐसा लगा था कि अब दिल्ली में चुनाव उठ जाएगा लेकिन अभी तक नेता हरकत में आते नहीं दिख रहे हैं। यहां तक चुनाव के दौरान सुबह से रात तक प्रत्याशियों और उनके समर्थकों की चहलकदमी का केंद्र बना रहने वाला प्रदेश कांग्रेस का कार्यालय आजकल सूना है। पदाधिकारियों का कहना है कि जब कोई काम बताने वाला ही नहीं है तो क्या करें।


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