कांग्रेस के 7 सांसदों की प्रतिष्ठा भी दांव पर

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Saturday, December 07, 2013-1:02 PM

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव के नजदीक आने से दिल्ली विधानसभा चुनाव हाई प्रोफाइल चुनाव में तब्दील हो गया है। यहां कांग्रेस सरकार के सभी 7 सांसदों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है।

उनके सामने यह चुनौती है कि राज्य सरकार के खिलाफ 15 साल के सत्ताविरोधी रुझान को उनका कामकाज किस हद तक कम कर पाता है। अगर मतदान का रुझान सत्ता विरोधी होता है तो यह परोक्ष रूप से स्थानीय सांसदों के खिलाफ जाएगा।

पिछले चुनाव में शीला दीक्षित ने तीसरी पारी की शुरुआत की थी और 2009 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने प्रदेश की सभी 7 संसदीय सीटों पर कब्जा जमाया था। इतना ही नहीं केंद्र सरकार में राज्य से कपिल सिब्बल, अजय माकन और कृष्णा तीरथ के रूप में 3 मंत्री भी बनाए गए, जबकि प्रदेश के कामकाज में दखल रखने वाले पूर्वी दिल्ली से सांसद व मुख्यमंत्री के पुत्र संदीप दीक्षित को कांग्रेस के केंद्रीय संगठन में भूमिका मिली।

ऐसे में कांग्रेस की अपेक्षा न सिर्फ अपने विधायकों से बल्कि सांसदों से भी है। बल्कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि विधानसभा चुनाव के नतीजों को उनके रिपोर्ट कार्ड के रूप में देखा जाएगा। सातों सीटों पर कब्जे के 3 साल बाद शहर में 3 नगर निगमों के गठन के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। तीनों निगमों की कुल 272 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस महज 78 सीटों पर सिमट गई थी।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि नगर निगम चुनावों का विधानसभा चुनाव पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता। यदि ऐसा नहीं होता तो वर्ष 2007 के नगर निगम चुनावों में हार के बावजूद पार्टी अगले साल विधानसभा चुनाव में नहीं जीतती। उनके इस दावे के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए जारी कश्मकश में निगम पार्षदों की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। खासकर, पूर्वी दिल्ली ने कांग्रेस को निराश किया।

कांग्रेस को उम्मीद थी कि निगम चुनावों में वह कम से कम पूर्वी दिल्ली में इज्जत बचाने में कामयाब होगी। लेकिन पार्टी को यहां भी जबरदस्त पराजय झेलनी पड़ी। नगर निगम की 64 में से उसे महज 19 सीटों पर ही विजय मिली, जबकि भाजपा ने 35 सीटें जीतकर सत्ता पर कब्जा जमाया। खास बात यह है कि इस इलाके से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित कांग्रेस के सांसद हैं।

जानकारों का मानना है कि अब विधानसभा चुनाव में भी पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाली 10 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि मुख्यमंत्री यह दावा करती रही हैं कि उनकी सरकार ने इस पिछड़े इलाके में भी विकास के खूब काम कराए हैं।

उत्तरी दिल्ली नगर निगम में भाजपा को 59 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को केवल 29 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इसी प्रकार दक्षिण दिल्ली में कांग्रेस को 30 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा ने 44 सीटों पर कब्जा जमाया था।


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