हवा बदलते ही दिग्गजों ने भी बदल लिए शामियाने

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Monday, December 09, 2013-11:50 AM

नई दिल्ली: 2013 के विधानसभा चुनावों में बहुत कुछ ऐसा रहा जो ऐतिहासिक था लेकिन रविवार सुबह 8 बजे जैसे ही मतगणना शुरू हुई इसकी ऐतिहासिकता में एक और पुट जुड़ गया। महज एक साल पहले बनी आम आदमी पार्टी ने अपने डेब्यू इलैक्शन में ही देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी और दिल्ली पर 15 साल से एकछत्र राज्य करने वाली पार्टी को ‘अन्य’ के कॉलम में धकेल दिया।

सच पूछा जाए तो 7 दिसम्बर के पहले तक, एग्जिट पोल के बावजूद, विश्लेषकों को ‘आप’ की इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं थी। यहां तक कि निवर्तमान मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज तक ने ‘आप’ को मामूली करार दिया था। इन दोनों पार्टियों का सुर तो मतदान के दूसरे दिन ही तब बदला जब एग्जिट पोल में ‘आप’ को तवज्जो मिलने लगी। सबसे पहले शीला दीक्षित ने दरवाजे खोले और ‘आप’ से गठजोड़ की संभावना के संकेत दिए तो भाजपा के विजय गोयल ने भी ‘आप’ का साथ लेने वाला बयान दिया।

इन सब के इतर ‘आप’ के निर्माण से लेकर मतदान के दिन तक पार्टी के लिए बहुत उतार चढ़ाव वाला समय रहा। पार्टी बनते ही अन्ना हजारे अलग हो गए तो किरण बेदी ने अलग ही राह चुन ली। इसके बाद अन्ना आंदोलन के दौरान इकठ्ठा हुए फंड को लेकर कुछ ‘असंतोष’ की बात सामने आई। ‘आप’ से जुड़ी हर सच्चाई और हर अफवाह सुर्खियां बनने लगीं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आया आदर्शवादी मानदंड पर उसे और कसा जाने लगा। यहां तक कि ‘आप’ की प्रत्याशी शाजिया इल्मी के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन भी सामने आया लेकिन पार्टी डिगी नहीं। वरन चुनाव के चंद दिन पहले एक प्रत्याशी के ऊपर मामला दर्ज होने पर उसकी उम्मीदवारी को रद्द कर दिया गया।

यहां तक कि चुनाव से बहुत पहले ही 20 करोड़ रुपए के फंड इकट्ठा करने के अपने लक्ष्य को पूरा होने के बाद पार्टी ने फंड लेने से मना कर दिया। ऐसा कुछ तो है जो वाकई आम जनता में उम्मीद को जगाता है। रविवार को अरविंद केजरीवाल  मानते हैं कि एक जिम्मेदार और ईमानदार कोशिश हुई है। यहां तक कि ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास अब लोकसभा में भी ताल ठोंकने की बात कर रहे हैं। चुनाव पूर्व अपने नाम के इस्तेमाल तक के लिए ऐतराज जताने वाले अन्ना हजारे का सुर बदला गया है।

मतगणना के रुझान आने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि अगर केजरीवाल मुख्यमंत्री बनते तो और अच्छा होता। बाबा रामदेव भी इसका श्रेय लेने से पीछे नहीं रहे। अधिकांश लोगों के लिए रविवार चमत्कार का दिन रहा। आम तौर पर परिवार का मुखिया ही बाकी सदस्यों के राजनीतिक दृष्टिकोण के लिए जिम्मेदार माना जाता है और मौजूदा राजनीतिक दलों का दारोमदार भी इसी पर रहता है लेकिन इस चुनाव में यह गणित फेल हो गया।

आखिर यह कैसे हुआ? दरअसल लोग इस बात को भूल गए कि राजधानी में चार लाख युवा वोटरों ने  भी एंट्री मारी है। इसके अलावा महिलाओं की भारी हिस्सेदारी ने भी समीकरण को ‘आप’ के पक्ष में किया। आंदोलन की जमीन से पैदा हुई ‘आप’ पार्टी ही नहीं किसी भी संगठन का अंदाजा उसके उदय के बाद ही लग पाता है।


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