गर होता अन्ना का आशीर्वाद तो...

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Monday, December 09, 2013-11:58 AM

नई दिल्ली (निहाल सिंह): दिल्ली विधानसभा के नतीजे आने के  पहले किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि एक नई नवेली पार्टी दिल्ली की सत्ता में भूचाल ला देगी। यहां तक कि आप नेता भी अपनी सफलता को लेकर इतने आश्वस्त नहीं दिख रहे थे, शायद इसलिए चुनाव के तुरंत बाद एकांतवास में चले गए थे। यहां तक कि वह जनता के सामने तब तक नहीं आए जब तक कि उन्होंने एक बड़े फासले से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हरा नहीं दिया।

अन्ना आंदोलन से आम लोगों की नजर में आए अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की फलक पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है लेकिन यदि उनके गुरु अन्ना हजारे का आर्शीवाद उन्हें प्राप्त होता तो दिल्ली के फलक पर सिर्फ आम आदमी का ही राज होता।

पहली बार राजनीतिक गलियारों में कदम रखने वाले अरविंद केजरीवाल के लिए 15 साल तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज रहने वाली मंजी हुई राजनीतिज्ञ शीला दीक्षित को हराना वाकई सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक माना जा सकता है।

जनलोकपाल के रास्ते अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने वाले अरविंद केजरीवाल को उनके गुरु अन्ना हजारे ने नाम के इस्तेमाल की मनाही कर दी था। उन्होंने खुद को केजरीवाल से पूरी तरह से अलग कर लिया लेकिन चुनाव के नतीजों के रुझान केजरीवाल की ओर जाते देख अन्ना काफी खुश दिखे। उन्होंने कहा कि वे केजरीवाल ने शून्य से शुरुआत की थी लेकिन आज वे बहुत आगे निकल गए हैं।

यह बात और है कि उन्हें बहुमत नहीं मिला है, एेसे में उनके लिए नए कानून बनाना और बदलाव लाना मुश्किल है। लोगों का कहना है कि यदि समय पर केजरीवाल के सिर पर अन्ना का हाथ होता तो अन्ना को यह शब्द कहने की नौबत ही  नहीं आती। अभी भी यदि अन्ना केजरीवाल को अपना समर्थन दे देते हैं तो देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आ सकता है।


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