राजधानी का कोई दावेदार नहीं

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Monday, December 09, 2013-3:12 PM

नई दिल्ली (अशोक शर्मा): विधानसभा चुनाव का परिणाम रविवार को घोषित होते ही सीटों का सस्पेंस खत्म हो गया है। जैसा अंदाजा था, विधानसभा त्रिशंकु ही बनी है। 15 वर्षों से सत्ता से दूर रही भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन सरकार बनाने के लिए आवश्यक 36 सीट हासिल करने से चूक गई है। अब लाख टके का सवाल है कि 36 का आंकड़ा हासिल कर कौन सरकार बनाएगा और कैसे? क्या दिल्ली को फिर से चुनाव का सामना करना पड़ेगा?

भाजपा को बेशक 9 सीटों का फायदा मिला है, लेकिन वह अकाली दल के साथ भी बहुमत के लिए जरूरी 36 से 4 सीटें कम हासिल कर पाई है। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी (आप) का जादू सिर चढ़कर बोला है और उसने कांग्रेस और भाजपा की 28 सीटों पर कब्जा कर लिया है, लेकिन वह भी सरकार बनाने के गणित से काफी दूर है।

कांग्रेस 35 सीटों पर नुकसान के साथ इस बार केवल 8 सीटों पर विजय हासिल कर सकी है। इस बार मुंडका सीट पर केवल एक निर्दलीय प्रत्याशी जीता है और मटिया महल सीट पर जेडीयू ने कब्जा किया है। अब सबकी निगाहें सरकार के गठन पर हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में किसी पार्टी के लिए 36 सीटें जुटाना संभव नहीं लग रहा।

कांग्रेस के दिल्ली प्रभारी डॉ. शकील अहमद ने कह दिया है कि हम बिना किसी शर्त के आम आदमी पार्टी को सहयोग देने के लिए तैयार हैं। लेकिन आप के नेता अरविंद केजरीवाल ने साफ कर दिया है कि वह गठजोड़ की राजनीति नहीं करना चाहते। उनका स्पष्ट कहना है कि हम कांग्रेस या भाजपा को समर्थन नहीं करेंगे।

ऐसे में यदि निर्दलीय और जेडीयू के विजयी उम्मीदवार किसी तरीके से भाजपा को समर्थन भी दे देते हैं, तो भी भाजपा सत्ता के गलियारे के समीप नहीं पहुंच सकेगी। दूसरी ओर, सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस के तीन विधायक भाजपा का साथ दे सकते हैं। इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है। कांग्रेस और भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। फिर क्या होगा?

चर्चा इस बात की है कि ऐसी स्थिति में क्या दिल्ली में आगामी छह महीने के लिए उपराज्यपाल का शासन लागू होगा और लोकसभा चुनाव के साथ ही दिल्ली विधानसभा का चुनाव फिर से होगा। चुनावी पंडितों की एक सोच यह भी है कि आम आदमी पार्टी सरकार में शामिल होने की बजाए बाहर से भाजपा को सहयोग कर देती है, तो सरकार बन सकती है। लेकिन उस सूरत में सरकार की चाभी आप पार्टी के हाथ में ही रहेगी।

लेकिन भाजपा को इस बात का डर सताएगा कि किसी भी मुद्दे पर मतभेद होने पर सरकार के खिलाफ अविश्वास लाकर सरकार गिर सकती है। शायद यह फार्मूला भाजपा को भी पसंद नहीं आएगा। इसलिए सरकार बनाने के लिए भाजपा के सामने जबरदस्त संकट बना हुआ है, जिसका समाधान खोजना आसान नहीं लग रहा है।


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