शांति मेडल प्राप्त पूर्व सैनिक अब मजदूरी करने पर मजबूर

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Monday, December 16, 2013-12:17 PM

हिसार:  'देश की आन बान और शान' के लिए जीवन कुर्बान कर देने का जज्बा रखने वाला यहां का बहादुर जवान भरत सिंह आज 53 साल की उम्र में मजदूरी करने को मजबूर है। श्रीलंका में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को श्रीलंकाई सैनिक की बंदूक के बट से बचाने वाले जवान की यह दुखदायी हालत देखकर दिल से पीड़ादायी आह के साथ यही सवाल मुंह से निकलता है कि क्या देश की सरकार अपने बहादुर सैनिको का इसी तरह सम्मान  करती है।

भारतीय सेना की पैरा रेजीमेंट में भर्ती होने के बाद श्रीलंका भेजी गई शांति सेना में वीरता दिखाने वाला भरत सिह शांति मेडल हासिल करने के बाद भी आज मजदूरी करने को मजबूर है। इस बहादुर सैनिक का दर्द भी गुमनामी में दबा हुआ था। मीडिया के सामने यह दर्द उस वक्त सामने आया जब हांसी के इतिहासकार जगदीश सैनी ने अपने प्लाट पर निर्माण कार्य शुरू किया।  कार्य के दौरान मिट्टी ने एक
मजदूर को फौजी कहकर पुकारा।

इस पर जगदीश सैनी ने फौजी पुकारे जाने वाले से पूछा कि आपको  फौजी क्यो कहते हैं? इतना कहते ही यह पूर्व सैनिक रो पडा और रोते हुए अपनी जो दास्तान सुनाई उसे सुनकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो गए।  महेंद्रगढ जिले की कनीना तहसील के गाव पोटा का रहने वाला भरत सिह जो कभी कंधे पर बंदूक रखकर दुश्मनो के छक्के छुडा देता था आज अपने कंधो पर ईटो का बोरा लिए हांसी में मजदूरी करने पर विवश है।

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