न्यायाधीश न करें असंवेदनशील, लैंगिक पक्षपात वाली टिप्पणी: HC

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Sunday, December 22, 2013-11:12 AM

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि न्यायाधीशों को महिलाओं से संबंधित मामलों में फैसला सुनाते वक्त ‘‘लैंगिक पक्षपात वाली’’ तथा ‘‘असंवेदनशील’’ टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने यह बात एक फास्ट ट्रैक अदालत की इस तरह की दो टिप्पणियों को हटाते हुए कही।

निचली अदालत के न्यायाधीश द्वारा बलात्कार के एक मामले में फैसला सुनाते समय की गई टिप्पणियों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति वी कामेश्वर राव ने कहा कि टिप्पणियां ‘प्रथम दृष्टया असंवेदनशील’ हैं।  पीठ ने आगे कहा कि लड़की के खिलाफ ‘‘अतिरंजित’’ टिप्पणियां ‘‘रिकॉर्ड में साक्ष्य पर आधारित नहीं’’ हैं।

इसने कहा कि यह स्पष्ट है कि टिप्पणियां रिकॉर्ड में साक्ष्य पर आधारित नहीं हैं। न्यायाधीश ने फैसला करते समय महिलाओं के संबंध में निजी राय को व्यक्त किया। न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि 19 से 24 साल उम्र की महिलाएं अपने प्रेमियों के साथ स्वेच्छा से भागती हैं। उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि टिप्पणी ‘‘किसी आनुभविक आंकड़े पर आधारित नहीं है।’’

पीठ ने कहा कि इस टिप्पणी से भारतीय समाज में महिलाओं के लिए दुविधा की स्थिति पैदा होती है। इसलिए उनके साथ सहानुभूति रखी जानी चाहिए, न कि उन्हें हास्य का पात्र बनाया जाना चाहिए। न्यायाधीश द्वारा की गई दूसरी टिप्पणी के संदर्भ में पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह की टिप्पणी एक तरह का उपदेश है कि लड़कियों को समाज में किस तरह का आचरण करना चाहिए।’’

पीठ ने कहा, ‘‘हर व्यक्ति को अपनी मर्जी के हिसाब से सामाजिक जीवन चुनने का अधिकार है, और यदि सामाजिक जीवन चुनने के क्रम में किसी को कोई नुकसान पहुंचता है तो कोई अदालत यह नहीं कह सकती कि आपने अपने जोखिम पर रास्ता चुना था और इसलिए व्यवस्था आपका रोना नहीं सुनेगी।’’


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