राजनेता हो या पत्रकार, सभी रहे नक्सलियों के निशाने पर

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Tuesday, December 24, 2013-11:43 AM

रायपुर: नक्सल समस्या छत्तीसगढ़ के साथ साथ देश के लिए भी बड़ी चुनौती साबित हो रही है। इस समस्या से जूझ रहे छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने वर्ष 2013 में अपने अभी तक के सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया और एक राजनीतिक दल के कई नेताओं को मार डाला। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए इस हमले ने देश को हिला कर रख दिया। इस वर्ष नक्सलियों ने राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ साथ पत्रकारों को भी अपना निशाना बनाया।

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2013 की शुरूवात नक्सली घटना से हुई थी। साल की पहली तारीख को पुलिस को कामयाबी मिली थी। राज्य के नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले में पुलिस ने मुठभेड़ के बाद दो नक्सलियों को गिरफ्तार कर हथियार बरामद किये थे। बहरहाल, यह खुशी सप्ताह भर ही रही और सात जनवरी को दंतेवाड़ा जिले की अदालत ने पुलिस दल पर किए गए सबसे बड़े ताड़मेटला हमले के 10 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। वर्ष 2010 में हुए इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवान मारे गए थे।

अदालत का यह फैसला निश्चित तौर पर पुलिस के लिए अच्छी खबर नहीं थी। नक्सलियों के हौसले बुलंद हुए और साल के मध्य में हुए एक भीषण हमले ने देश वासियों को चिंतित कर दिया। मई महीने की 25 तारीख को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल के नेतृत्व में राज्य सरकार के खिलाफ शुरू की गई परिवर्तन यात्रा बीजापुर जिले से वापस आ रही थी कि बस्तर जिले में झीरम घाटी के करीब नक्सलियों ने कांग्रेस नेताओं के काफिले पर गोलीबारी शुरू कर दी।

इस हमले में नक्सलियों ने पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत 31 नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस कर्मचारियों की हत्या कर दी। हमले में गंभीर रूप से घायल पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की बाद में अस्पताल में मौत हो गई। नक्सलियों के इस हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। केंद्र सरकार ने इस हमले की एनआईए से जांच कराने की घोषणा कर दी वहीं राज्य शासन ने घटना के न्यायिक जांच के आदेश दे दिए।

यह पहली बार नहीं है कि नक्सलियों ने राज्य में राजनीतिक दलों के नेताओं की हत्या की है। लेकिन इस हमले में नक्सलियों ने कांग्रेस की पहली पंक्ति के लगभग सभी नेताओं से को मार डाला। राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के मुताबिक नक्सलियों ने नवंबर महीने तक 97 लोगों की हत्या की है जिनमें 41 पुलिस कर्मी, दो सहायक आरक्षक, एक नगर सैनिक, एक अन्य शासकीय कर्मी और 52 नागरिक शामिल हैं।

इस दौरान पुलिस ने 32 नक्सलियों को भी मार गिराया वहीं 400 नक्सलियों को गिरफ्तार किया है। जबकि इस दौरान 27 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। अधिकारियों के मुताबिक, पुलिस ने नवंबर महीने तक 10 नक्सली कैंप को ध्वस्त किया तथा 175 हथियार जब्त किये। वहीं जब्त बारूदी सुरंगों की संख्या 128 रही है। नक्सलियों ने इस वर्ष के शुरूआती महीने में ही बड़ी घटना को अंजाम देने की कोशिश की थी जब जनवरी माह में वायु सेना के हेलिकॉप्टर को निशाना बनाया था। इस हमले में हेलीकॉप्टर में सवार वायरलेस आपरेटर घायल हो गए थे।

इस वर्ष पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ का भी आरोप लगा। मई महीने में ही बीजापुर जिले में मुठभेड़ में सीआरपीएफ के जवान के शहीद होने के बाद पुलिस ने जमकर गोलीबारी की। इस हमले में कुछ नक्सली भी मारे गए लेकिन आठ ग्रामीणों की भी मृत्यु हो गई। बाद में जब विपक्ष ने हंगामा मचाया तब मुठभेड़ के न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। हालंकि कांग्रेस सीबीआई जांच के लिए अड़ी रही। नक्सलियों ने साल भर उत्पात जारी रखा। मई महीने में कांग्रेस नेताओं की हत्या के बाद राज्य में जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। लेकिन इसके बाद भी नक्सलियों ने अगस्त महीने में बस्तर क्षेत्र में वन मंत्री विक्रम उसेंडी के भाई सुमंत उसेंडी की गोली मारकर हत्या कर दी। 

वर्ष 2013 एस्सार का पैसा नक्सलियों तक पहुंचाने के आरोप में जेल में बंद शिक्षिका सोनी सोरी के लिए सुकून देने वाला रहा। उच्चतम न्यायालय से सोरी को जमानत मिलने के बाद नवंबर महीने में रिहा कर दिया गया। सोरी दिल्ली में है। अभी तक यह माना जा रहा था कि नक्सली पत्रकारों पर हमला नहीं करते हैं। लेकिन राज्य में हुई दो घटना ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है। साल के शुरूआती फरवरी महीने में नक्सलियों ने सुकमा जिले में पत्रकार नेमी चंद जैन की धारदार हथियार से हत्या कर दी। वहीं इस महीने की छह तारीख को नक्सलियों ने बीजापुर जिले में पत्रकार साईं रेड्डी को दौड़ा दौड़ाकर धारदार हथियार से मार डाला। रेड्डी एक ऐसे पत्रकार थे जिन पर नक्सली सहयोगी होने का आरोप लगा था और वह नक्सलियों के भी निशाने पर थे।
 


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