धारा 377 मामला: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुर्नविचार याचिका दाखिल

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Tuesday, December 24, 2013-5:38 PM

नई दिल्ली: समलैंगिक अधिकारों के पक्षधर वर्ग ने आज उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर समलैंगिक यौनाचार को दंडनीय अपराध घोषित करने वाले शीर्ष अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध किया। इस वर्ग का तर्क है कि यह समलैंगिक समुदाय के मौलिक अधिकारों के हनन जैसा है।

समलैंगिकों के कल्याण के क्षेत्र में सक्रिय गैर सरकारी संगठन नाज फाउण्डेशन ने अनुरोध किया है कि उसकी पुनर्विचार याचिका पर खुले न्यायालय में सुनवाई की जाये। इसी संगठन की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक यौनाचार को अपराध के दायरे से बाहर करने का निर्णय सुनाया था।

इस संगठन के अनुसार शीर्ष अदालत के निर्णय में अनेक कानून से जुड़ी त्रुटियां हैं जिन्हें दुरूस्त करने की जरूरत है।पुनर्विचार याचिका के अनुसार, ‘‘शीर्ष अदालत इस दलील पर विचार करने में विफल रही है कि धारा 377 से पुरूषों के बीच होने वाले यौनाचार में पुरूषों के स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होता है क्योंकि समलैंगिक यौनाचार का अपराधीकरण एचआईवी की रोकथाम के प्रयासों सहित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में बाधक है। इस दलील का समर्थन तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी किया है।’’

गैर सरकारी संगठन ने शीर्ष अदालत के निर्णय पर रोक का अनुरोध करते हुये कहा है कि हजारों समलैंगिकों ने उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद पिछले चार साल में अपनी यौन पहचान सार्वजनिक कर दी थी और अब वे कानूनी कार्यवाही की आशंकाओं से घिरे हैं।


इस फैसले की तीव्र आलोचना होने पर केन्द्र सरकार ने भी शीर्ष अदालत में इस पर पुनर्विचार के लिये याचिका दायर कर रखी है। केन्द्र सरकार ने इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुये कहा है कि हजारों समलैंगिंकों को अन्याय से बचाने के लिये इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। केन्द्र सरकार का यह भी कहना है कि यह निर्णय टिकाउ नहीं है क्योंकि इसमें त्रुटियां हैं।


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