आज ही के दिन गूंजा था 'जन गण मन'

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Friday, December 27, 2013-1:50 PM

नई दिल्ली: राष्ट्र गान 'जन गण मन' शुरू होते ही हर भारतीय सम्मान के साथ खड़ा हो जाता है। आज भी हर भारतीय राष्ट्र गान शुरू होने पर वहीं रुक जाता है जहां वह खड़ा होता है यहीं राष्ट्र गान के लिए सच्चा सम्मान है। राष्ट्र गान 'जन गण मन' आज ही के दिन पहली बार साल 1911 में इंडियन नैशनल कांग्रेस के कोलकाता सेशन में गाया गया। हर भारतीय के दिल को छू जानेवाले इस खूबसूरत गान को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है। राष्ट्र गान शुरू होते ही हर भारतीय के शरीर में एक सिरहन सी दौड़ पड़ती है हालांकि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राष्ट्र गान अंग्रेजों की प्रंशसा के लिए लिखा था।

क्यों लिखा गया राष्ट्र गान

क्या किसी ने जन गण मन गाते सोचा की आखिर ये कौन ‘अधिनायक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ हैं जिनके जयघोष से हम अपने राष्ट्रगान की शुरुआत करते हैं? सन् 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया।

 

पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लैंड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाए। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि उन्हें एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की अंग्रेजों के लिए बहुत सहानुभूति थी।

 

रविंद्रनाथ टैगोर ने जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीकत में ही अंग्रेजों की खुशामद में लिखा गया था और इसके लिए रविन्द्रनाथ टेगोर को महात्मा गांधी से बहुत बुरी तरह से डांट भी पड़ी थी। वहीं जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था और जब उसे पता चला कि यह गीत उसकी प्रशंसा में है तो उसने रविंद्रनाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार देना चाहा लेकिन रविंद्रनाथ टैगोर ने नोबल पुरस्कार लेने से मना कर दिया और फिर उन्हें गीतांजलि नामक रचना के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया।


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