आपसी सहमति से तैयार तलाक का दस्तावेज वैध नहीं : अदालत

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Sunday, December 29, 2013-3:07 PM

मुंबई: बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि महज आपसी सहमति से कोई दस्तावेज तैयार कर पति-पत्नी तलाक नहीं ले सकते। उच्च न्यायालय ने एक परिवार अदालत के उस आदेश को भी खारिज कर दिया जिसने आपसी सहमति से छह महीने की आवश्यक इंतजार अवधि में छूट के साथ तलाक मांगने वाले दंपति की याचिका खारिज कर दी थी। दंपति, मित्तल और मनोज पंचाल की हिंदू रीति रिवाज से अप्रैल 2007 में शादी हुई थी लेकिन एक साल के भीतर ही विचारों में सामंजस्य नहीं होने और भिन्नता के कारण विवाद उत्पन्न हो गया।

उन्होंने अलग होने का फैसला किया और जून 2011 में आपसी सहमति से ‘तलाक का दस्तावेज’ तैयार किया। उस समय उनको इसकी जानकारी नहीं थी कि इस तरह के तलाक को कानून मान्यता नहीं देता। दोनों ने फिर शादी की और महिला ने अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन किया क्योंकि उसका दूसरा पति वहीं रह रहा था। हालांकि, उसे वीजा नहीं मिला क्योंकि अमेरिकी दूतावास ने अदालती तलाक आदेश की मांग की। बाद में उसने अपने पहले पति से मदद मांगी जिसने सहयोग किया। जरूरी छह महीने की इंतजार अवधि में छूट की मांग करते हुए आपसी सहमति से तलाक के लिए दोनों ने हिंदू विवाह कानून की धारा 13-बी के तहत परिवार अदालत में याचिका दाखिल की। परिवार अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी जिसके बाद महिला ने बंबई उच्च न्यायालय का रूख किया।


न्यायमूर्ति वी के ताहिलरमाणी की अध्यक्षता वाली उच्च न्यायालय की एक पीठ ने हाल में आदेश दिया कि हमारी राय है कि (परिवार अदालत का) आदेश तथ्यों और कानून के हिसाब से मानने योग्य नहीं है।  परिवार अदालत ने यह भी कहा कि तलाक के कागजात, याचिकाकर्ताओं के बीच एक समझौता होने के कारण खारिज नहीं किया जा सकता सिवाए इस आधार पर कि करार के लिए इसे जबरदस्ती अथवा दबाव अथवा धोखाधड़ी से लाया गया हो।

उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिका को खारिज करने के लिए परिवार अदालत के बताए गए तर्क कानूनी तौर पर खरे नहीं उतरते। पीठ ने कहा कि तलाक को माना जाना चाहिए क्योंकि शादी खत्म हो चुकी थी और बाद में दोनों पक्ष अलग-अलग हो गए तथा तलाक के लिए आपस में सहमत हुए। पीठ ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह को दो लोगों के बीच अनुबंध के तौर पर नहीं माना जाता। हिंदू कानून के तहत इसे दो लोगों के बीच पवित्र रिश्ता माना जाता है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि दंपति के बीच तलाक का पत्र तामील होने के बावजूद शिकायतकर्ताओं के बीच कानूनी तौर पर शादी का बंधन नहीं खत्म हुआ था। इसलिए हिंदू विवाह कानून की धारा 13 बी के तहत दायर याचिका विचार योग्य है। पीठ ने कहा कि चूंकि दोनों ने फिर शादी कर ली इसलिए जरूरी छह माह की अवधि तक इंतजार करने के लिए कहने की कोई वजह नहीं है। इसलिए, इस मामले को तलाक आदेश जारी करने के लिए परिवार अदालत को वापस भेजा जाता है और पक्षों से 2 जनवरी 2014 को परिवार अदालत के सामने उपस्थिति होने को कहा जाता है।


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