महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में अदालतों ने सख्ती दिखाई

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Monday, December 30, 2013-12:44 PM

नई दिल्ली: पिछले साल 16 दिसंबर को सामूहिक बलात्कार की वीभत्स घटना के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए आवाज तेज हो गई और फास्ट-ट्रैक अदालतों ने 2013 में कुछ कठोर फैसले किए। 16 दिसंबर की घटना के बाद सड़कों पर जनता की नाराजगी के बाद अधिकारियों ने बलात्कार, छेड़छाड़, पीछा करने और घूरने जैसे अपराधों के मामलों से विशेष रूप से निपटने के लिए इस साल की शुरुआत में छह फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की।

 

राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह के मामलों की बढ़ती तादाद ने चिंता का माहौल पैदा कर दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय में भी गलत तरह से घूरने की एक घटना सामने आई जहां महिला विश्रामकक्ष में महिला वकीलों की मोबाइल पर फिल्म बनाई गई। इसके बाद शीर्ष अदालत द्वारा 1997 में विशाखा मामले में तय किए गए दिशानिर्देशों को अमल में लाने की मांग ने जोर पकड़ लिया।  पिछले साल इस बात की तसल्ली जरूर रही कि 16 दिसंबर की जघन्य घटना समेत कुछ मामले न्याय की परिणति तक पहुंचे लेकिन कुछ मामलों में अभी तक फैसला नहीं हो सका है जिनमें पांच साल की एक बच्ची के साथ दो पुरुषों द्वारा दुष्कर्म की घटना भी शामिल है।

 

गत 15 अप्रैल को बच्ची से बलात्कार के मामले में मुकदमे का सामना कर रहे दोनों आरोपियों के खिलाफ अदालत ने सख्ती दिखाते हुए स्वत: ही बलात्कार और अप्राकृतिक अपराध के प्रावधानों को लागू किया। इस मामले में ‘बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण कानून’ (पॉस्को) के तहत आरोप तय किए गए जो पिछले साल नवंबर में प्रभाव में आया था। 16 दिसंबर के सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद ही भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया गया और कड़े प्रावधान शामिल किए गए।

 

बलात्कार पीड़ित की मृत्यु हो जाने या उसके शारीरिक रूप से अक्षम हो जाने की स्थिति में दोषी को मौत की सजा देने का प्रावधान रखा गया। इस तरह छेड़छाड़, पीछा करने और घूरने जैसी गतिविधियों को भी गैर-जमानती अपराधों की श्रेणी में रखा गया। साल 2013 की आखिरी तिमाही में अदालत ने 16 दिसंबर की घटना के दोषियों को मौत की सजा सुनाई। बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच दुष्कर्म और यौन अपराधों की झूठी शिकायतों में भी इजाफा हुआ और अदालतों ने कहा कि न्यायपालिका जनता के शोर-शराबे के दबाव में नहीं आ सकती।

 

बलात्कार के मामलों और ऐसी घटनाओं को लेकर झूठी शिकायतों पर ज्वलंत बहस के बीच एक न्यायाधीश के इस बयान ने विवाद खड़ा कर दिया कि ‘‘लड़कियां उचित तरीके से शादी से पहले यौन संबंध नहीं बनाने के लिए नैतिक तथा सामाजिक रूप से बाध्य हैं और अगर वे ऐसा करती हैं तो यह वे अपने जोखिम पर करेंगी तथा फिर उनका यह रोना नहीं सुना जा सकता कि उनके साथ बलात्कार हुआ।’’


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