रिश्वत रोकने के लिए सौ लोग भी नहीं

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Monday, December 30, 2013-2:06 PM

नई दिल्ली (सतेन्द्र त्रिपाठी): दिल्ली की आबादी डेढ़ करोड़ से अधिक है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए मात्र 60-70 लोगों की टीम। यह टीम दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की है। इस शाखा की हालत यह है कि महीने में औसतन 2 मुकद्दमे भी दर्ज नहीं होते।

ऐसे में इस टीम के भरोसे तमाम रिश्वतखोरों को रंगे हाथ पकडऩे का दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सपना कैसे पूरा हो पाएगा। उन्होंने रिश्वतखोरों को चेतावनी तो दे दी, लेकिन भ्रष्ट लोगों की नाक में नकेल कसने के लिए सबसे पहले उन्हें इस शाखा का ही कायाकल्प करना होगा। शाखा को पूरी आजादी देनी होगी।

दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के पिछले 2 साल का हाल देखें तो उस पर तरस आता है। वर्ष 2012 में 21 और 2013 में मात्र 23 मुकद्दमे इस शाखा में दर्ज हुए हैं। किस भ्रष्ट कर्मचारी या अधिकारी को पकड़ा पब्लिक को नहीं पता। आखिर पता लगे भी तो कैसे। खुद दिल्ली सरकार ने ही शाखा के अफसरों को मीडिया से बात करने पर पाबंदी लगा रखी है।

जब रिश्वतखोरों को पकडऩे का प्रचार नहीं हुआ तो शिकायत भी कम आईं। पुराने मुकद्दमों की पैरवी का दबाव अलग से। ऐसे में स्टाफ का कम होना भी अखरता है। शाखा के अधिकारियों का कहना है कि स्टाफ बढ़ाने के साथ-साथ पूरी सुविधाएं देकर आजादी से काम करने दिया जाए तो रिश्वत पर बहुत हद तक लगाम लगाई जा सकती है।इस शाखा की हालत भी यह है कि वह बस छोटे-मोटे रिश्वतखोरों तक पहुंच पाती है। बड़े-बड़े मगरमच्छों तक उसके हाथ नहीं पहुंच पाते हैं। नई तकनीक का सहारा लेने की शाखा जरूरत भी महसूस नहीं करती है। पुराने ढर्रे पर चलकर भ्रष्टाचार रोक पाना आसान नहीं होगा।

शाखा में बंद हो चुके हैं स्टिंग ऑपरेशन: वर्ष 2007 सितम्बर से लेकर 2009 मार्च तक भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने वो काम कर दिखाया था, जो शाखा के पचास साल के इतिहास में नहीं हुआ था। इस दौरान यहां ईमानदार अधिकारी डॉ. एन. दलीप कुमार तैनात थे। उन्होंने आम लोगों को मोबाइल से स्टिंग करना सिखाया। इसका नतीजा यह निकला कि ताबड़तोड़ मुकद्दमे दर्ज हुए।भ्रष्टाचारियों की पूरी-पूरी चेन पकड़ी गई। पहले सिपाही व चपरासी पकडऩे वाली शाखा ने सहायक आयुक्त व निगम के उपायुक्त तक को पकड़ा। कई अफसर भी लपेटे में आए।
इसका पूरा प्रचार भी हुआ।

इसका नतीजा यह हुआ कि रिश्वतखोरों से दुखी लोग खूब आने लगे, लेकिन शाखा की जांच की आंच जब आई.ए.एस. अधिकारियों तक पहुंचने लगी तो उस पर ही लगाम लगा दी गई। मीडिया से बात नहीं करने का फरमान जारी कर दिया गया। उनका तबादला होने के कुछ समय बाद तक तैनात रहे उपायुक्त आई.डी. शुक्ला ने भी कुछ करने का प्रयास किया, लेकिन इन दोनों अधिकारियों के जाने के बाद शाखा का काम एकदम ठंडा हो गया।

शाखा ने कसी थी पब्लिक स्कूलों पर लगाम: वर्ष 2010 में शाखा ने उपायुक्त आई.डी. शुक्ला के नेतृत्व में कुछ पब्लिक स्कूलों पर भी लगाम कसी थी। 3-4 स्कूलों के खिलाफ मुकद्दमे भी दर्ज हुए थे। इससे घबराकर पब्लिक स्कूलों की लॉबी ने दिल्ली सरकार पर दबाव बना दिया था। शाखा में उस वक्त तैनात रहे अफसरों में कुछ करने की इच्छा थी। इसी कारण खेती की जमीन पर अवैध निर्माण करने वालों पर भी मुकद्दमे हुए। 200 एकड़ से अधिक भूमि भी मुक्त हुई। समाज कल्याण विभाग में हुए घोटाले भी खुले।

लोकपाल के बिना भ्रष्टाचार रोकना मुश्किल
भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के चीफ रहे पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी डॉ. एन. दलीप कुमार कहते हंै कि बिना लोकपाल के भ्रष्टाचार पर रोक लगा पाना मुश्किल है। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा से लेकर सभी विभागों की विजीलेंस यूनिट को एक्टिव करना होगा। शाखा में स्टाफ बढ़ाने के साथ-साथ ईमानदार अफसरों की तैनाती करनी होगी। उनका कहना है कि आप पार्टी से बहुत उम्मीदें हैं। इस पार्टी की सरकार ने तो आते ही रिश्वतखोरों को पकडऩे की चेतावनी दे दी है। दरअसल में यह चेतावनी भी बहुत काम करेगी। भ्रष्टाचारियों में डर होना बहुत जरूरी है। अगर कोई भ्रष्टाचारी पकड़ा जाए तो उसका पूरा प्रचार हो। शाखा पर लगाई मीडिया से बात न करने की पाबंदी भी हटनी चाहिए।

 


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