इस एक करोड़ से बढ़ेगा संघर्ष का जज्बा

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Tuesday, December 31, 2013-2:15 PM

नई दिल्ली (अकु श्रीवास्तव): दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल विनोद कुमार की मौत एक साधारण और रुटीन घटना बनकर फाइलों में दफन हो सकती थी। लेकिन नई सरकार ने उनकी शहादत को सम्मान और परिवार को जो संबल प्रदान किया है वह दूसरे कर्मचारियों को भी कर्तव्य पालन की राह पर बेझिझक आगे बढऩे की प्रेरणा देगा। आप सरकार ने न सिर्फ विनोद कुमार को शहीद कहकर संबोधित किया, बल्कि पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपए देने का एलान किया है।

विनोद की मौत शुक्रवार को उस समय हुई जब दक्षिण जिले के वसंतकुंज में शराब तस्करों के एक गिरोह ने उन पर हमला कर दिया। तस्करों का गिरोह हरियाणा से अवैध शराब लेकर आ रहा था। खबर मिलने पर आबकारी विभाग की टीम ने उनका पीछा शुरू किया और इसी क्रम में घिटोरनी गांव से होकर सुनसान इलाके में पहुंच गई। वहीं पर तस्करों ने टीम पर हमला कर दिया। आबकारी विभाग की टीम में डैपुटेशन पर तैनात दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल विनोद कुमार भी थे ।हमले में घायल विनोद कुमार की अस्पताल पहुंचाए जाने के दौरान मौत हो गई। मीडिया में भी एक सामान्य सी खबर छपी कि शराब माफिया ने कांस्टेबल की हत्या कर दी।

हमारे समाज में अब तक ‘पुलिसकर्मी की हत्या’ को शहादत के तौर पर नहीं देखा जाता है। शहीद तो सिर्फ सेना या अर्धसैनिक बलों के जवानों को ही माना जाता है। बड़ी मुठभेड़ में अगर कई पुलिसवाले मारे जाते हैं, तो जरूर उन्हें शहीद का दर्जा दे दिया जाता है और फिर इसके बाद जो होता है उसे खानापूर्ति ही कह सकते हैं।

परिवार वालों को कुछ मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। वैसे भी हमारे देश में मुआवजे पर बहस का रिवाज पुराना है। ट्रेन एक्सीडैंट में मौत हुई तो लाख रुपए, नदी में बस गिर गई तब भी इतना ही मुआवजा। दंगों में मारे गए तो 2 से 5 लाख। यूपी में किसी एक खास वर्ग से हैं तो थोड़ा ज्यादा मुआवजा। मंत्री या उसके गुर्गों के हाथों पीटकर मारे गए तो दस लाख की सहायता। विमान दुर्घटना का मुआवजा पिछले कुछ दिनों से सुनने को नहीं मिला।

सामान्य मानी जानी वाली ऐसी-वैसी मौतों के अलावा शहीद कहलाने का हक तो आम तौर पर सेना या अर्धसैनिक बलों के पास ही रहा है। सीमा पर आतंकवादियों की गोलियों से छलनी होने या फिर उग्रवादियों/माओवादियों का शिकार होने पर शहीद का तमगा मिल जाता है। ऐसे सिपाहियों को कर्तव्य के पालन के दौरान दुर्घटना में या उग्रवादी हिंसा में मारे जाने पर सिर्फ दस लाख देकर इतिश्री कर दी जाती है। दूसरी तरफ, मुठभेड़ और प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने वालों के परिवार को पंद्रह लाख रुपए मुआवजा मिलता है।

लेकिन साल के अंत में सोमवार को अरविंद केजरीवाल की ‘आप’ सरकार ने जो घोषणा की उससे न सिर्फ पुलिसकर्मियों को अपने काम में जी-जान लगा देने का जज्बा मिलेगा बल्कि मुठभेड़ में यदि जान भी चली जाए तो शहीद कहलाने का गौरव भी मिलेगा। ‘आप’ ने जब चुनावी सभाओं में किसी मुठभेड़ में मारे जाने पर दिल्ली पुलिसकर्मी को एक करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी, तो उस समय न मुझे यकीन हुआ था न किसी और को।

कांस्टेबल विनोद कुमार के परिजनों को मुआवजे के तौर पर एक करोड़ रुपए देने की घोषणा कर्तव्यनिष्ठों को आगे बढऩे की प्रेरणा देगी और साथ ही उस परिवार के लिए एक संबल का काम करेगी जिसने अपना सबकुछ खो दिया था। एक घोषणा और उसे लागू करना, कितना क्रांतिकारी, ये सिर्फ एक वायदे को पूरा करने से समझा जा सकता है।


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