वर्ष 2013: उत्तराखंड आपदा ने झकझोर दिया था पूरे देश को

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Wednesday, January 01, 2014-6:08 AM

नई दिल्ली: शिव की धरती केदारनाथ में 2013 के मध्य में आई आपदा ने संहार और तबाही का जो तांडव मचा उसने सिर्फ उत्तराखंड को ही तहस नहस नहीं किया बल्कि पूरे देश को रुला दिया और दुनिया को प्रकृति की ताकत के समक्ष अपनी क्षमता को देखने का एक और दर्पण भी दे दिया। केदारनाथ में आपदा 16 और 17 जून की रात ऐसे वक्त पर आई जब ज्योतिॄलग की यात्रा चरम पर थी और श्रद्धालु बड़ी संख्या में शिव दर्शन के लिए केदारनाथ में थे या उसके करीब थे। मंदिर के ऊपरी हिस्से में बने विशाल ताल के टूटने से यह आपदा आई जिसने मंदिर परिसर में तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए बने कई आवासीय भवनों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। जल प्रलय ने हजारों लोगों की एक झटके में जान ले ली। मंदिर के रास्ते में गौरी चट्टी, रामबाडा, गौरीकुंड आदि स्थानों पर भी जमकर तबाही हुई और जल प्रलय के मार्ग में आए सभी कस्बे इसमें समा गए।

आपदा के कारण असंख्य लोग मारे गए और हजारों पशु खासकर यात्रा मार्ग पर चलने वाले घोडे प्रलय की भेंट चढ गए। केदारनाथ पहुंचने के लिए वाहन का आखिरी पडाव गौरीकुंड है और इससे करीब पांच किलोमीटर पहले सोन प्रयाग है। सोनप्रयाग से रास्ता खराब है और गौरीकुंड पहुंचने में बहुत समय लगता है इसलिए कई यात्री सोनप्रयास से ही पैदल चलना शुरु कर देते हैं। गौरीकुंड, रामबाड़ा और गौरी चट्टी होते हुए यात्री करीब 14 किमी की पैदल यात्रा तय कर केदारनाथ पहुंचते हैं। रात को हो सकता है कि पैदल मार्ग पर भी शायद यात्री रहे हों। जल प्रलय से यह पैदल मार्ग पूरी तरह ध्वस्त हो गया और केदारघाटी ही उजाड़ बन गई। असंख्य यात्री केदारनाथ में फंसे रहे जिन्हें सेना ने विशेष अभियान चलाकर दस दिन के भीतर फाटा, गुप्तकाशी, गोचर और देहरादून पहुंचाया। तबाही में असंख्य लोग तबाह हो गए और कई लोग यात्रा के बाद फिर कभी अपनों से नहीं मिल सके।


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