आसान नहीं जनलोकपाल बिल का सफर

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Friday, January 03, 2014-8:27 AM

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा में विश्वासमत प्राप्त करने के बाद अब आम आदमी पार्टी (आप) ने 15 दिनों के भीतर जनलोकपाल बिल लाने की कवायद तेज कर दी है। इसी के साथ पार्टी ने  अपने 16 अन्य एजेंडे को लागू  करने की प्रक्रिया तेज  करने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। मगर जनलोकपाल बिल को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार में टकराव होने की संभावना जतायी जा रही है।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है। ऐसे में केंद्र ने दिल्ली के लिए अलग से कार्य निष्पादन नियमावली बनाई हुई है। इसके तहत राज्य सरकार जमीन, कानून और पुलिस पर पर कोई विधेयक विधानसभा में पेश नहीं कर सकती। दिल्ली विधानसभा व लोकसभा के पूर्व सचिव एस. के. शर्मा का कहना है कि दिल्ली को लेकर केंद्र ने जिस तरह की नियमावली बनाई है उसमें जनलोकपाल बिल विधानसभा में पेश हो ही नहीं सकता।

अगर केजरीवाल सरकार इस तरह का विधेयक लेकर आती है तो उसे दिल्ली के उपराज्यपाल केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेज देंगे। वहीं, केंद्र ने पहले से ही लोकपाल बिल संसद में पारित करा दिया है। ऐसे में अब यह देखना भी जरूरी होगा कि केंद्र के लोकपाल बिल से जनलोकपाल बिल में किसी तरह का टकराव तो नहीं होगा। हालांकि उनका कहना है कि सारी स्थितियों को देखने के बाद अगर केंद्र से सहमति मिल जाए तो सरकार जनलोकपाल बिल विधानसभा में पारित करा सकती है। लेकिन दिल्ली में पहले से ही लोकायुक्त कानून पास है और ऐसे में पहले इस कानून को निरस्त करना होगा।

दिल्ली के शिक्षा एवं लोक निर्माण मंत्री मनीष सिसौदिया का कहना है कि जनलोकपाल के अलावा सरकार अब अपने दूसरे एजेंडे पर भी तेजी से काम शुरू करेगी। इसके तहत स्कूलों की दशा सुधारने, अवैध कॉलोनियों की तस्वीर बदलने, वीआईपी संस्कृति से दिल्ली को पूरी तरह मुक्त करने, बदहाल सड़कों को अतीत का मुद्दा बनाने, निजी स्कूलों की मनमानी रोकने, ठेकेदारी प्रथा के जरिए होने वाले शोषण पर रोक लगाने व किसानों के भूमि का अधिग्रहण जबर्दस्ती नहीं करने जैसे मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाने की बात की जा रही है। 


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