कौन संभालेगा उप्र में कासिम की कुर्सी?

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Saturday, January 04, 2014-2:37 PM

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की फतेहपुर सदर विधानसभा सीट के विधायक के कार्यकाल के दौरान हुए निधन की वजह से मतदाताओं को उपचुनाव में अपना नया जनप्रतिनिधि चुनना होगा। यहां ऐसा आजादी के बाद पहली बार हो रहा है। वैसे इस जनपद की किसी भी सीट पर आज तक ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी।

गत विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के टिकट पर निर्वाचित हुए लोकप्रिय राजनीतिज्ञ सैयद कासिम हसन का सोमवार को निधन हो जाने के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई। उधर, सीट खाली होते ही जनपद के राजनीतिक गलियारे में चर्चाएं तेज हो गई हैं तथा विधायक बनने का ख्वाब संजोने वालों में एक बार फिर राजनैतिक आंकड़े बैठाने शुरू कर दिए हैं। सदर सीट पहली बार कासिम हसन ने सपा के लिए जीती थी। प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के चलते इस सीट पर पुन: कब्जे के बाबत सत्तारूढ़ दल पर अतिरिक्त दबाव भी होगा। ऐसे में सपा नेतृत्व किसे प्रत्याशी बनाता है यह तो समय के गर्भ में है, लेकिन चुनाव लडऩे के इच्छुक सपा नेताओं के बीच सुगबुगाहट तेज हो गई है।

सपा विधायक के अंतिम संस्कार के साथ एक राजनीतिक युग का तो अंत हो गया, लेकिन नई राजनीतिक बानगी इस क्षेत्र की आबो-हवा में तैरने लगी है। अगले वर्ष प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के साथ ही रिक्त हुई फतेहपुर विधानसभा सीट के लिए भी चुनाव होने की संभावनाएं बलवती हैं। ऐसे में प्रमुख राजनीतिक दलों के लोगों का अभी से सक्रिय हो जाना भी लाजमी है।

सपा के साथ-साथ प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी बसपा के लिए भी यह चुनाव काफी अहम साबित हो सकता है। वहीं पूर्व में कई बार सदर सीट से जीत सुनिश्चित करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर एक बार फिर सीट वापस लेने की चुनौती होगी। वर्ष 1991 से लगातार सदर सीट से भाजपा के प्रत्याशी बनते रहे राधेश्याम गुप्त के समक्ष अब असमंजसपूर्ण स्थिति है। विगत विधानसभा चुनाव में शिकस्त के बाद राधेश्याम ने अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए टिकट मांगा है।

ऐसी संभावनाएं भी बलवती हैं कि उनका नाम टिकटार्थियों की जमात में आगे है। ऐसे में अब देखना यह है कि राधेश्याम गुप्त अपेक्षाकृत ज्यादा चुनौतीपूर्ण लोकसभा चुनाव पर ध्यान केंद्रित करते हैं या फिर वापस विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी सीट वापस पाने के लिए मंथन करते हैं। फतेहपुर सदर विधायक के निधन के बाद उत्पन्न राजनीतिक स्थितियां संसदीय चुनावी माहौल पर भी असर डालेंगी। वैसे तो लोकसभा चुनाव की धमक सभी छह विधानसभा सीटों पर आधारित है, लेकिन सदर सीट के साथ में चुनाव होने की स्थिति में संसदीय प्रत्याशियों का भी काफी कुछ ध्यान शहरी सीट पर केंद्रित होगा। वहीं, सदर सीट से विधानसभा का चुनाव लडऩे वाला प्रत्याशी अपनी पार्टी के लोकसभा प्रत्याशी के लिए भी संबल प्रदान करेगा। ऐसे में एक तरफ संसदीय प्रत्याशी की समस्याएं बढ़ेंगी तो दूसरी ओर सहयोगपूर्ण स्थितियों का लाभ भी मिल सकता है।





 


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