दिल्ली हाई कोर्ट: मौत के बाद आई न्याय की तारीख

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Saturday, January 04, 2014-8:35 PM

नई दिल्ली (मनीषा खत्री): माना जाता है कि देरी से मिला न्याय, न मिलने के बराबर होता है। पर अदालत में लंबित मुकद्मों में अक्सर तारीख पर तारीख ही मिलती रहती है। कई बार तो ऐसा होता है कि न्याय की आस में लोग मर जाते हैं, लेकिन उनको न्याय देने वाली तारीख अभी बाकी ही रह जाती है।

आज एक ऐसा ही मामला दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष देखने में आया है। सी.आर.पी.एफ के एक कांस्टेबल ने वर्ष 1998 में अपनी बर्खास्तगी को न्यायालय में चुनौती दी थी। तब से लेकर अब तक इस मामले में उसे तारीख के बदले कुछ नहीं मिला। कांस्टेबल न्याय की आस में तीन साल पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया था।

न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग व न्यायमूर्ति जयंतनाथ की खंडपीठ ने इस मृतक कांस्टेबल धनपत सिंह की बर्खास्तगी को अब गलत करार दिया है। खंडपीठ ने कहा कि धनपत पर लगाए गए आरोपों के संबंध में सी.आर.पी.एफ कोई सबूत पेश नहीं कर पाई है।

सी.आर.पी.एफ को निर्देश दिया जाता है कि वह धनपत की पत्नी को उसकी बर्खास्तगी से लेकर उसके मरने के दिन तक की अवधि के वेतन व अन्य भत्तों का 50 प्रतिशत राशि दें। इतना ही नहीं उसकी पेंशन की सुविधा भी उसकी पत्नी को दी जाए। धनपत सिंह वर्ष 1985 में सी.आर.पी.एफ में बतौर कांस्टेबल तैनात हुआ था।

पांच मई 1988 को हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक व्यक्ति बाबू लाल ने शिकायत की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि धनपत ने यह नौकरी फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर पाई है। उसका असली नाम तो सुमेर सिंह है और उसके बड़े भाई का नाम धनपत सिंह है।

इस मामले में 14 जनवरी 1992 को हरियाणा सरकार के सहायक सचिव ने पत्र लिखकर सी.आर.पी.एफ को बताया कि उनके पास पुराने प्रमाण पत्रों का रिकार्ड नष्ट हो चुका है। वर्ष 1998 में उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी थी और कहा था कि सी.आर.पी.एफ को निर्देश दिया जाए कि उसे नौकरी पर वापिस रखा बुलाया जाए। अब इस मामले में फैसला आया है, लेकिन धनपत की मौत तो 11 फरवरी 2011 को ही हो गई थी।


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