कॉमन मोबलिटी कार्ड ठंडे बस्ते में

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Sunday, January 05, 2014-2:23 PM

 नई दिल्ली (धनंजय कुमार): इसे इच्छा शक्ति की कमी कहिए या लापरवाही। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने 2 वर्ष पहले जिस योजना की शुरूआत बड़े उत्साह से की थी, वह योजना ठंडे बस्ते में तो डाल दी गई। आलम यह है कि विभाग के अधिकारियों को इस जनोपयोगी योजना के बारे में जानकारी तक नहीं है। नतीजा आज भी यह योजना कागजों पर चल रही है और लोग कहीं लम्बी कतार में खड़े होकर तो कहीं धक्का-मुक्की करते हुए यात्रा टिकट ले रहे हैं।

दरअसल 6 दिसम्बर 2011 को केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ ने कॉमन मोबलिटी कार्ड योजना की शुरूआत की थी और इस कार्ड के बहुद्देशीय उपयोग को देखते हुए इसका नाम राष्ट्रीय पक्षी मोर के नाम पर मोर रखा था। उस वक्त घोषणा की गई थी कि इसे दिल्ली मैट्रो के अलावा, जयपुर, कर्नाटक तथा बेंगलुरू के सार्वजनिक वाहनों में लागू किया जाएगा। साथ ही इसे भोपाल म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में भी लागू किए जाने की बात कही गई थी।

खास बात यह है कि उस वक्त यू.टी.आई.इंफ्रास्ट्रक्चर टैक्नोलॉजी एंड सर्विस लिमिटैड नामक कम्पनी को इसकी जिम्मेदारी भी दी गई थी। ताकि  निर्धारित समय के अंदर कार्ड तथा इसे पंच करने वाली मशीन बनाकर दी जाए। इसी बीच अगस्त 2012 में केंद्रीय शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्णा ने इसे दिल्ली मैट्रो के लिए अलग से लांच किया और दिल्ली मैट्रो समेत मैट्रो फीडर बस, दिल्ली परिवहन निगम तथा कलस्टर बसों में अगले 6 महीने में लागू करने की घोषणा की।

उस वक्त शास्त्री पार्क से मयूर विहार तथा अक्षरधाम से वसुंधरा एंक्लेव तक चलने वाली 2 रूटों की 10 मैट्रो फीडर बसों में इसे तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया गया था। विडम्बना यह रही कि करीब डेढ़ वर्ष बाद भी इस योजना का लागू होना तो दूर मैट्रो स्टेशनों से भी यह मोर कार्ड गायब हो गया। इस बारे में दिल्ली मैट्रो के मुख्य जनसम्पर्क  निदेशक (ई.डी.) अनुज दयाल कहते हैं कि यह योजना पूरी तरह से केंद्र सरकार की थी, इसलिए हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।


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