तो इसलिए केजरीवाल नहीं लगा रहे ‘जनता दरबार’!

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Wednesday, January 15, 2014-2:40 PM

नई दिल्ली: जनता दरबार नहीं लगाने का फैसला मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने क्यों लिया? यह सवाल राजनीतिक गलियारों से लेकर आम आदमी के बीच चल रहा है। राजनीतिज्ञ और दिल्ली वाले जो चर्चा कर रहे हैं उसमें काफी हद तक सच्चाई भी है। सवाल है कि कहीं इन वजहों के कारण ही तो मुख्यमंत्री पीछे नहीं हटे। इस तरह के कमेंट करते हुए लोगों ने यू टर्न का निशान बनाकर सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर प्रतिक्रिया दी है।

अवैध निर्माण को लेकर आती हैं ज्यादा शिकायतें
इसको रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस और नगर निगमों पर है।
पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है और उत्तरी, पूर्वी और दक्षिण तीनों निगमों मेें भाजपा का शासन है।
अवैध निर्माण की शिकायत पर सीधे कार्रवाई कराने में सरकार को दिक्कत होती है।

डी.डी.ए. से संबंधित शिकायत आने पर भी मजबूरी
दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) भी दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है।

गृह मंत्रालय के निर्देश पर काम करती है राज्य की पुलिस
अपराध से संबंधित शिकायत आने पर भी दिल्ली सरकार सीधी कार्रवाई नहीं कर सकती।
जनता दरबार में मिलने वाली शिकायतों के लिए केन्द्र सरकार को कागज बढ़ाना पड़ता है।
इस स्थिति में मुख्यमंत्री द्वारा किया गया शीघ्र कार्रवाई का वादा पूरा नहीं हो पाता।

आम लोगों की शिकायतें
55 -   प्रतिशत अवैध निर्माण और अतिक्रमण।    
30 -   प्रतिशत पुलिस से सबंधित शिकायतें।         
15 -   प्रतिशत अन्य मामलों की शिकायतें।
2456- अतिक्रमण की शिकायतें वर्ष 2013 में की गईं।
 702-  शिकायतें पुलिस की मिलीभगत से जुड़ी थीं।


सी.एम. के पहले जनता दरबार में उमड़ा था रेला
2582 - ही ली जा सकी थीं शिकायतेें।
848 -  खुद मुख्यमंत्री देख रहे हैं।
917 -  शिक्षा मंत्री को दी गईं।
49 -    कानून मंत्री सोमनाथ भारती को दी गईं।
285 -  परिवहन मंत्री सौरभ भारद्वाज को भेजीं।
198 -  श्रम मंत्री गिरीश सोनी को मार्क की गईं।
185 - स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को दी गईं।
116 - महिला एवं बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला को दी गईं।


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