जिम्मेदारियों से बच रही है केजरीवाल एंड पार्टी

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Wednesday, January 22, 2014-12:21 AM

नई दिल्ली : अरविंद केजरीवाल पिछले एक दशक से विरोध और मांग पर आधारित आंदोलनों की राजनीति करते रहे हैं। विरोध की राह बहुत आसान होती है लेकिन काम करना आसान नहीं होता। ऐसे में अरविंद केजरीवाल के सामने मुख्यमंत्री के तौर पर दायित्वों का निर्वहन आसान नहीं है।

ऐसा नहीं है कि तमाम लोग केजरीवाल एंड पार्टी  का तरीका एकदम सही ठहरा रहे हों, बल्कि ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो मान रहे हैं कि ऐसा करके केजरीवाल अपने दायित्वों से बच रहे हैं। यही नहीं आगे कांग्रेस का ठप्पा कहीं उन पर न लग जाए और चुनाव के समय किए गए वायदों को पूरा न करना पड़ जाए, इन सबसे ध्यान दूसरी ओर केंद्रित कर देने का प्रयास भी आम आदमी पार्टी कर रही है। इसके लिए तमाम तर्क भी दिए जा रहे हैं।

केजरीवाल अब तक जवाब मांगते रहे हैं लेकिन अब जवाबदेही बन रही है। अगर वे आंदोलन नहीं करते हैं तो उन पर समझौतावादी होने के आरोप लगने लगेंगे और लोगों को उम्मीदें टूटने लगेंगी। वैसे भी केजरीवाल ने 18 ऐसे वायदे किए हुए हैं जो अन्य राजनेताओं के लिहाज से पूरने हाने लायक ही नहीं हैं, या यूं कहें कि उन्हें पूरा करना संभव नहीं है।

इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी निर्धारित समयावधि के अनुसार पूरा हो जाना चाहिए था। कुछ की निर्धारित अवधि निकल चुकी है और कुछ तो पूरे होते नजर नहीं आ रहे हैं। जो जैसे-तैसे पूरे किए गए हैं वे भी शक के घेरे में हैं।  जन लोकपाल बिल की किसी को होश नहीं है। बिजली पानी के वायदों का भी यही हाल है।

कहा जा रहा है कि खुद को घिरता देख केजरीवाल अब हर बात पर आंदोलन की राह पकड़ रहे हैं। जब वे जानते थे कि पुलिसवालों को हटाया जाना संभव नहीं था तो फिर वे ्रधरने पर क्यों गए? क्या लोगों का ध्यान नहीं भटकाया जा रहा? इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले अपने आपको हीरो बनाए रखना भी इस तरह के आंदोलनों से ही संभव है।

केजरीवाल के बारे में कहा जाने लगा है कि वे कांग्रेस के एजैंट के रूप में काम कर रहे हैं या फिर पपेट बन गए हैं। इन आरोपों का जवाब भी तभी दिया जा सकता था जब कांग्रेस नीत केंद्र सरकार पर हमला किया जाए। इस आंदोलन में ये ही हुआ। केजरीवाल और उनकी पार्टी जानती है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दिल्ली के बाहर अन्य राज्यों में कांग्रेस की मदद से सरकार चलाने की बात को समझाना बहुत मुश्किल होगा।

ऐसे में दिल्ली पुलिस के मुद्दे के बहाने धरने पर बैठे केजरीवाल को कांग्रेस और केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधने का मौका मिल गया। केजरीवाल और उनकी पार्टी को राजनीतिक तौर पर यह फायदेमंद साबित हुआ।


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