बिजली कम्पनियां पहुंचीं हाईकोर्ट

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Thursday, January 23, 2014-12:49 AM

नई दिल्ली : दिल्ली में बिजली सप्लाई करने वाली प्राईवेट कम्पनियों ने प्रस्तावित ऑडिट को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि सीएजी की शक्तियों के दायरे में दिल्ली की बिजली कंपनियां नहीं आती हैं। सीएजी से सूचीबद्ध संस्थान पिछले 10 सालों से लगातार उनका ऑडिट कर रहे हैं।

डी.ई.आर.सी. भी इलैक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 में दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए, बिजली कंपनियों का कई स्पैशल ऑडिट कर चुकी है। प्रस्तावित सी.ए.जी. ऑडिट को चुनौती देते हुए बिजली कंपनियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है।

दिल्ली में बिजली सप्लाई करने वाली बी.एस.ई.एस. के प्रवक्ता चंद्र पी.के.कामंथ का कहना है कि दिल्ली की बिजली कंपनियां दिल्ली सरकार के साथ 51: 49 प्रतिशत की साझीदार हैं। उनके पास अकाऊंटिंग का काफी मजबूत और पारदर्शी सिस्टम है। यही नहीं, आंतरिक और बाहरी दोनों तौर पर उनकी ऑडिटिंग होती है।

प्रतिष्ठित ऑडिटिंग एजैंसियां इन बिजली कंपनियों का ऑडिट करती हैं। ये ऑडिटिंग एजैंसियां सी.ए.जी. के साथ भी सूचीबद्ध यानी इंपैनल्ड हैं। बिजली कंपनियों के अकाऊंट्स उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्टरों द्वारा प्रमाणित हैं। बिजली वितरण कम्पनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सरकार के प्रमुख अधिकारी जैसे मुख्य सचिव, वित्त सचिव और ऊर्जा सचिव भी शामिल हैं।

दूसरे प्रतिष्ठित इंडिपैंडैंट डायरेक्टर्स भी उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल हैं। डिस्कॉम्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा प्रमाणित अकाऊंट्स डी.ई.आर.सी.  में प्रूडेंस चैक के लिए जमा किए जाते हैं। डी.ई.आर.सी. इंडिपैंडैंट रेगुलेटर है।

उसकी मदद प्राइस वॉटर हाऊस कूपर्स, क्रिसिल, ए.एस.सी.आई., डेलॉइट हसकिंस और सैल्स जैसी नामी इंडिपैंडैंट एजैंसियां करती हैं। डिस्कॉम्स के कुल खर्चे का 85 प्रतिशत हिस्सा बिजली की खरीद में चला जाता है। बिजली उत्पादन कंपनियों का पहले से ही सी.ए.जी. ऑडिट हो रहा है। इस तरह, डिस्कॉम्स के 85 प्रतिशत खर्चों का ऑडिट हो ही रहा है। 


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