बादशाह अकबर की मस्जिद आज भी अतीत को संजाये है

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Thursday, January 23, 2014-10:54 AM

हरदोई:  मुगल बादशाह अकबर की करीब साढे चार सौ साल पुरानी एतिहासिक मस्जिद अपने अतीत को संजोये मुगलिया दौर की गाथा गा रही है।  मुगलकालीन समय की यह इमारत देश की ऐतिहासिक धरोहरो में से एक है जिसका बदलते वक्त के साथ जीर्णोद्धार तो हुआ है लेकिन आज के दौर में भी ये इमारत पुरानी यादे ताजा कर रही है। उत्तर प्रदेश में हरदोई जिला मुख्यालय से करीब 24 किमी दूर गोपामऊ कस्बे की ऐतिहासिक जामा मस्जिद को लगभग 450 बरस पूर्व मुगल बादशाह अकबर ने इसे बनवाया था1 कहते है कि मुगल बादशाह का काफिला इधर से गुजरा था और यहां पर उसने अपना पडाव डाला था इसलिए मुगल बादशाह ने उसे रास्ते पर अपनी यादें छोडते यहां पर इस मस्जिद का निर्माण कराया था। मुगल शैली की इस मस्जिद के बारे में कहा जाता है कि जैसी अयोध्या में तीन गुम्बदों वाली बाबरी मस्जिद थी उसी की तरह इस मस्जिद की डिजाईन है और यह दिखने में हूबहू वैसी ही लगती है जैसी अयोध्या की बाबरी मस्जिद थी।

मौलाना मोहम्मद इरफान नदवी के अनुसार यह छोटी ईंट और गारे से मिल कर बनी जामा मस्जिद के बरामदे में दाखिल होते ही अरबी में लिखा पत्थर और उस पर लिखी आयतें इस मस्जिद की भव्यता और महत्व को प्रदॢशत करती है1  मुगलिया दौर की इस इमारत को बनाने में कई बातों का विशेष रुप से ध्यान रखा गया था खासकर वास्तुकला और शिल्पकला की नजर से इस इमारत की कई खास चीजें है जो मुगलकाल की याद दिलाती है।  इस इमारत की दीवारे चार से पांच फुट चौडी है और इसके गुम्बदों की ऊंचाई भी कई फुट ऊंची है जिसकी वजह से सॢदयों के महीने में सर्दी और गर्मियों के महीने में गर्मी का अकीदतमंदों को अहसास नही होता था। इमारत को बनाने में छोटी और बडी ईंटों का प्रयोग के साथ ही पत्थरों का भी प्रयोग कर एक विशेष तरह की जुडाई कर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने बताया कि मस्जिद में अकीदत मंदों की आवाज बाहर भी सुनाई दे इस बात का भी ख्याल इसकों बनवाते समय रखा गया था एक हाल से दूसरे हाल तक बिना किसी अवरोध के आवाज आ जा सकती है। मस्जिद में दो बडे हाल है और एक बडा मैदान जिसमें तमाम लोग नमाज पढ सकते हैं। गुम्बद की खास बात यह है कि इसमें जो शिल्पकारी की गयी है ऐसी शिल्पकारी अक्सर  मंदिरों में भी देखने को मिल जाती है।

 अनस फारुकी बताते है गोपामऊ के ही शेख हबीबुल्ला चिश्ती अकबर के दरबारी थे अकबर ने उन्हें ही इस मस्जिद का निर्माण कराने का जिम्मा सौंपा था जिसे उन्होंने पूरा किया1 उनके नाम से यहां एक मोहल्ला भी है जिसे चिश्ती मोहल्ले के नाम से जाना जाता है। शेख हबीबुल्ला चिश्ती शेख ताजुद्दीन चिश्ती के पौत्र थे जिन्होंने अल्तमस के समय गोपामऊ फतह किया था।  यहां के रहने वाले मौलाना मोहिसीनुद्दीन कासमी ने बताया कि गुजरते समय के साथ जब जब ये इमारत जर्जर होने लगी तो कई बार इसका जीर्णोद्धार किया गया। करीब सन्1800 के आसपस पिं्रस आफ आर्कट के नवाब मो.बालाजाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया था जब ये इमारत कुछ वर्षो बाद ढहने लगी तो सन ्2007 में अंजुमन शबाब लखनऊ नामक संस्था ने इसका जीर्णोद्धार कराया जिसके कारण ये बुलंद मस्जिद आज भी अपनी ऐतिहासिक छटा को बिखेर रही है।  मुगल काल की ऐतिहासिक धरोहर हरदोई की ये अकबर द्वारा निर्मित जामा मस्जिद का लगातार जीर्णोद्धार के चलते अब मूल रुप भले ही कुछ बदल गया हो लेकिन इसकी यादों के अवशेष आज भी जिंदा है जो इसकी महता को आज भी प्रदॢशत कर रहे हैं।
 


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