भुल्लर की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदलने की याचिका पर SC सुनवाई को सहमत

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Friday, January 24, 2014-4:24 PM

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय खालिस्तानी आतंकी देवेन्दरपाल सिंह भुल्लर की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के लिये दायर सुधारात्मक याचिका पर आज विचार के लिये सहमत हो गया। न्यायालय ने करीब दस महीने पहले भुल्लर की मौत की सजा उम्र कैद में तब्दील करने से इंकार कर दिया था। शीर्ष अदालत के हाल के निर्णय के मद्देनजर प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आज कहा कि भुल्लर की पत्नी की सुधारात्मक याचिका पर 28 और 29 जनवरी को सुनवाई की जायेगी और इसके लिये याचिका पर नोटिस जारी करना होगा।

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने हाल ही में अपने फैसले में कहा था कि दया याचिका के निबटारे में अत्यधिक विलंब होने या मुजरिम की मानसिक हालत ठीक नहीं होने की स्थिति में उसकी सजा को उम्र कैद में तब्दील किया जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता के टी एस तुलसी ने भुल्लर की पत्नी की याचिका का उल्लेख किया और अनुरोध किया कि उसकी मेडिकल जांच करायी जाये क्योंकि वह मानसिक बीमारी से ग्रस्त है।  भुल्लर की पत्नी ने शीर्ष अदालत के 12 अप्रैल के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी जिसमें दया याचिका के निबटारे में विलंब के आधार पर उसकी सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का अनुरोध किया गया था। लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी।

खालिस्तानी लिबरेशन फोर्स के आंतकी भुल्लर को सितंबर, 1993 में दिल्ली में हुये बम विस्फोट कांड के सिलसिले में मौत की सजा सुनायी गयी थी। इस विस्फोट में नौ व्यक्ति मारे गये थे और युवक कांग्रेस के अध्यक्ष एम एस बिट्टा सहित 25 अन्य जख्मी हो गये थे।

शीर्ष अदालत ने 26 मार्च, 2002 को मौत की सजा के खिलाफ भुल्लर की अपील खारिज कर दी थी। निचली अदालत ने अगस्त 2001 में मौत की सजा सुनायी थी जिसकी पुष्टि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2002 में कर दी थी। भुल्लर ने 14 जनवरी, 2003 को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर की थी। राष्ट्रपति ने आठ साल से अधिक बीत जाने के बाद 14 मई, 2011 को उसकी दया याचिका खारिज कर दी थी।

भुल्लर ने आठ साल से अधिक समय के विलंब का हवाला देते हुये एक बार फिर शीर्ष अदालत से मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने की गुहार की थी। लेकिन न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया था। इसके बाद, गत 21 जनवरी को शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि दया याचिकाओं के निबटारे में अत्यधिक विलंब ऐसे मुजरिम की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का आधार हो सकता है। न्यायालय ने इसके साथ ही 15 मुजरिमों की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया था।
 


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