पश्चिम बंगाल में भी छाया मोदी का जादू

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Tuesday, January 28, 2014-11:28 AM

कोलकाता: ऐसा प्रतीत होता है कि नरेंद्र मोदी की लहर पश्चिम बंगाल तक पहुंच गई है क्योंकि भाजपा की राज्य इकाई की सदस्यता में दोगुना से अधिक बढ़ौतरी हुई है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक नेता ने कहा कि वर्ष 2011 में राज्य में पार्टी की कुल सदस्यता करीब 3 लाख थी जो वर्ष 2013 में 7 लाख से अधिक हो गई। पिछले 6 माह में पार्टी के 2 लाख नए सदस्य बने हैं। पार्टी के नेता इसका श्रेय अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को देते हैं।

भाजपा के प्रवक्ता और पार्टी की बंगाल इकाई के सह-प्रभारी सिद्धांत सिंह ने बताया कि पार्टी की युवा शाखा ए.बी.वी.पी. की सदस्यता में भी बढ़ौतरी हुई है और पिछले एक साल में ही उसमें 45,000 नए कार्यकत्र्ता जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा की अल्पसंख्यक एवं महिला शाखाओं की सदस्यता में भी 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। सिंह ने बताया, ‘‘पश्चिम बंगाल में भाजपा की सदस्यता बढऩे के पीछे 2 मुख्य कारक हैं-पार्टी द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना और राज्य में विपक्ष का एक तरह से अभाव।’’

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने बताया कि ऐसा उत्साह पहले 2 अवसरों पर देखा गया-एक तो 90 के दशक के शुरू में राम मंदिर आंदोलन के दौरान और दूसरा केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान। सिंह ने बताया, ‘‘मोदी का करिश्मा पूरे देश में है और बंगाल इससे अलग नहीं रहा। कोलकाता में 5 फरवरी को मोदी की रैली के दौरान हम इसे साबित कर देंगे।’’

सामान्यत: भाजपा और आर.एस.एस. का पश्चिम बंगाल में गहरा प्रभाव नहीं रहा। हालांकि पार्टी के पूर्ववर्ती स्वरूप ‘जनसंघ’ की सह-स्थापना माटी पुत्र श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। राज्य में मुस्लिमों की आबादी 27 फीसदी है जो राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से कम से कम 140 में खासा प्रभाव रखती है। यह आबादी सत्ता के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभाती रही है। इस आबादी को अग्रणी राजनीतिक दल लुभाने के लिए प्रयासरत हैं।

भाजपा की लोकप्रियता इसी बात से समझी जा सकती है कि आगामी लोकसभा चुनावों में 42 लोकसभा सीटों में भाजपा प्रत्याशी के तौर पर लडऩे के लिए अलग-अलग वर्ग के 425 आवेदकों ने इ‘छा जाहिर की है। आर.एस.एस. भी दक्षिण और उत्तर भारत में अपनी जगह बना रहा है तथा इसमें सत्तारूढ़ पार्टी की अल्पसंख्यकों के कथित तुष्टीकरण की नीतियों की भूमिका है।

राज्य में 20 साल के अंतराल के बाद आर.एस.एस. की 3 दिवसीय एक युवा कार्यशाला आयोजित की गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत की अगुवाई में हुई इस कार्यशाला के बाद राज्य के हर हिस्से या हर शाखा में सदस्यों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई। आर.एस.एस. के एक अधिकारी ने बताया, ‘‘पिछले करीब अढ़ाई साल में राज्य में आर.एस.एस. का प्रभाव बढ़ा है। अब दक्षिण बंगाल में हमारी 280 शाखाएं और उत्तरी बंगाल में 700 से अधिक शाखाएं हैं।’’भाजपा और आर.एस.एस. के प्रभाव में हुई वृद्धि को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और वामदलों ने स्वीकार भी किया है।


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