पंजाब केसरी लाला लाजपत राय को 149वीं जयंती पर याद किया गया

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Tuesday, January 28, 2014-10:55 AM

जौनपुर: उत्तर प्रदेश में जौनपुर जिले के सरावां गांव में स्थित शहीद लाल बहादुर गुप्त स्मारक पर आज हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी एवं लक्ष्मीबाई ब्रिगेड के कार्यकर्ताओं ने महान स्वतंत्रता सेनानी एवं बलिदान की प्रतिमूर्ति पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की 149वीं जयंती मनाई गई। शहीद स्मारक पर कार्यकर्ताओं ने मोमबत्ती और अगरबत्ती जलाई और मौन रखकर महान स्वतंत्रता सेनानी शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

 

इस अवसर पर शहीद स्मारक पर उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए लक्ष्मीबाई ब्रिगेड की अध्यक्ष मंजीत कौर ने कहा कि लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के मोगा जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम लाला राधा कृष्ण अग्रवाल था। वह पेशे से अध्यापक और उर्दू के लेखक थे। लाला लाजपत राय ने वकालत की पढाई पूरी कर हिसार एवं लाहौर में वकालत शुरू की। वह देश में स्वावलम्बन से स्वराज लाना चाहते थे। देश में 1897 और 1899 में आये अकाल में उन्होंने पीड़ितों की तन-मन और धन से सेवा की थी। 

 

मंजीत कौर ने कहा कि लाला लाजपत राय ने अपना सर्वोच्च बलिदान साइमन कमीशन के समय दिया। 30 अक्तूबर 1928 को इंग्लैंड के प्रसिद्ध वकील सर जान साइमन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय आयोग लाहौर आया और उसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। उन्होंने कहा कि पूरे भारत से साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था। साइमन कमीशन का विरोध करते हुए लालाजी ने नारा दिया। अंग्रेजों वापस जाओ। इसके जवाब में अंग्रेजों ने लालाजी पर जमकर लाठीचार्ज किया। अपने ऊपर पडी लाठियों के जवाब में लालाजी ने कहा था कि मेरे शरीर पर लगी एक-एक लाठी अंगेजी साम्राज्य के लिए कफन साबित होगी।

 

लालाजी ने उस समय अंगेजी साम्राज्य के ताबूत में कील के रूप में उधम सिंह और भगत सिंह को तैयार कर दिया था। 17 नवम्बर 1928 को लालाजी का देहान्त हो गया। उन्होंने कहा कि लालाजी की सहादत बर्बाद नहीं गई और न ही उनके कातिल अधिक समय तक जिन्दा रहे। देश के महान क्रांतिकारी राजगुर ने 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस अफसर सांडर्स को मार डाला था।


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