सुप्रीम कोर्ट ने देविन्दर पाल सिंह भुल्लर की फांसी पर रोक लगाई

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Friday, January 31, 2014-2:34 PM

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने आज खालिस्तानी आतंकवादी देविंदरपाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा पर रोक लगा दी और अपने ही उस फैसले की समीक्षा पर सहमति जताई जिसमें उसने वर्ष 1993 में दिल्ली में हुए बम विस्फोट मामले के इस दोषी की मौत की सजा को उम्र कैद में बदलने का आग्रह खारिज कर दिया था।

प्रधान न्यायमूर्ति पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली चार न्यायाधीशों की एक पीठ ने भुल्लर की पत्नी नवनीत कौर द्वारा दाखिल सुधारात्मक याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किए।पीठ में न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा, न्यायमूर्ति एच एल दत्तू और न्यायमूर्ति जे एस मुखोपाध्याय भी शामिल हैं।

समझा जाता है कि भुल्लर कथित तौर पर मानसिक बीमारी से पीड़ित है। उसका इलाज ‘‘इन्स्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलायड साइंसेज’’ (आईएचबीएएस) में चल रहा है। पीठ ने आईएचबीएएस को उसकी हालत के बारे में एक सप्ताह के अंदर मेडिकल रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।  


पीठ ने कहा ‘‘हम विचार करेंगे कि क्या :क्षमा याचिका पर फैसले में विलंब के आधार पर मौत की सजा को उम्र कैद में बदलने के बारे में: हमारा फैसला इस मामले में लागू हो सकता है या नहीं। हम उसकी :भुल्लर की: वर्तमान हालत के बारे में भी जानना चाहते हैं।’’ चार न्यायमूर्तियों की इस पीठ ने कहा ‘‘हम आईएचबीएएस को देविन्दरपाल सिंह भुल्लर की हालत के बारे में एक सप्ताह के अंदर हमें रिपोर्ट भेजने का आदेश देते हैं।’’ भुल्लर की मौत की सजा को उम्र कैद में बदलने के लिए उसकी पत्नी का आग्रह उच्चतम न्यायालय के 21 जनवरी के फैसले के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इस फैसले में न्यायालय ने कहा था कि मौत की सजा का सामना कर रहे दोषी की क्षमा याचिका पर फैसले में अत्यधिक विलंब मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का आधार हो सकता है।  नवनीत कौर ने उच्चतम न्यायालय के उस फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह किया है जिसमें न्यायालय ने भुल्लर की क्षमा याचिका पर फैसला करने में सरकार की ओर से विलंब के आधार पर उसकी मौत की सजा को उम्र कैद में बदलने का उसका (नवनीत कौर का) अनुरोध ठुकरा दिया था।


भुल्लर को सितंबर 1993 में नयी दिल्ली में बम विस्फोट करने का दोषी ठहराते हुये उसे मौत की सजा सुनाई गई थी। इस विस्फोट में 9 लोग मारे गए थे और युवक कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मनिन्दरजीत सिंह बिट्टा सहित 25 घायल हो गए थे।
निचली अदालत ने अगस्त 2001 में भुल्लर को मौत की सजा सुनाई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2002 में भुल्लर की मौत की सजा को बरकरार रखा था। इस फैसले को भुल्लर ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। न्यायालय ने 26 मार्च 2002 को भुल्लर की अपील खारिज कर दी थी। भुल्लर ने पुनरीक्षण याचिका दाखिला की जिसे 17 दिसंबर 2002 में खारिज कर दिया गया। भुल्लर ने इसके बाद सुधारात्मक याचिका दायर की जिसे न्यायालय ने 12 मार्च 2003 को ठुकरा दिया।

इसी बीच, भुल्लर ने 14 जनवरी 2003 को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की। राष्ट्रपति ने 8 साल के अंतराल के बाद उसकी दया याचिका 14 मई 2011 को खारिज कर दी। दया याचिका के निबटारे में विलंब का हवाला देते हुए उसने फिर उच्चतम न्यायालय में अपनी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के लिए गुहार लगाई लेकिन उसका अनुरोध खारिज कर दिया गया।

उच्चतम न्यायालय ने  21 जनवरी को व्यवस्था दी कि दोषियों की दया याचिका पर फैसले में अत्यधिक विलंब मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का आधार हो सकता है। इसके साथ ही न्यायालय ने चंदन तस्कर वीरप्पन के चार सहयोगियों सहित 15 मुजरिमों की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करते हुये उन्हें राहत दे दी।  न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मौत की सजा पर अमल में अत्यधिक विलंब का ऐसे मुजरिमों पर ‘अमानवीय असर पड़ता’ है जो अपनी दया याचिकायें लंबित होने के कारण सालों तक मौत के साये में वेदना का सामना करते हैं।


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