कांग्रेस का नया प्लान अब चुनाव जीतना नहीं, मोदी को रोकना है

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Sunday, February 02, 2014-2:03 PM

नई दिल्ली: टी.वी. एंकर अरनव गोस्वामी को इंटरव्यू देने के बाद न सिर्फ कांग्रेस पार्टी की किरकिरी हुई है, बल्कि पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की इमेज का ग्राफ भी काफी नीचे आया है। इसके चलते कांग्रेस पार्टी को अपनी नई रणनीति बनाने पर विवश होना पड़ा है। नई रणनीति के अनुसार पार्टी का फोकस अब तीसरी बार सत्ता में आने पर नहीं, बल्कि मोदी को रोकने पर रहेगा। वैसे तो यह बात राहुल के इंटरव्यू के दौरान ही समझ में आ गई थी कि कांग्रेस को पता चल गया है कि सत्ता में अब उसकी वापसी बहुत मुश्किल है। इंटरव्यू में राहुल से जब-जब पूछा गया कि क्या 2014 में आपकी सरकार बनेगी तो उन्होंने हां जरूर कहा लेकिन उसमें वजन नहीं दिख रहा था, जिससे लगता था कि राहुल को इस बात पर संदेह है।

बदले समीकरणों के चलते अब कांग्रेस तीसरे मोर्चे को पीछे से समर्थन देकर किंंगमेकर का रोल अदा करने की सोच रही है क्योंकि उसे पता है कि आर्थिकता और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मोदी पर हमला करने से उसे कोई फायदा होने वाला नहीं और सहयोगी दलों को जोड़े बिना भाजपा सत्ता में आ नहीं सकती और यदि भाजपा की इतनी लहर होने के बावजूद नरेंद्र मोदी उसे सत्ता में न ला पाए तो उनकी छवि पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। भाजपा की इसी कमजोरी का कांग्रेस तीसरे मोर्चे को बाहर से समर्थन देकर फायदा उठाना चाह रही है। कांग्रेस के इस कदम से राहुल गांधी को अपनी पार्टी के नवीनीकरण का मौका भी मिल जाएगा।

जद (एस) प्रमुख एच.डी. देवेगोड़ा और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही बार-बार कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री बनने की उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है लेकिन अब ये दोनों तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद में जुट गए हैं। मोर्चे का मकसद यह होगा कि जब भी जरूरत पड़ी तो वह धर्मनिरपेक्षवाद को बचाएगा और साम्प्रदायिक ताकतों (मोदी) को सत्ता में आने से रोकेगा। इस मोर्चे में समाजवादी पार्टी, जनता दल (एस), बहुजन समाज पार्टी आदि दलों को जोडऩे पर भी विचार-विमर्श हो रहा है। यह भी हकीकत है कि तीसरे मोर्चे की सरकार भाजपा या कांग्रेस के समर्थन के बिना नहीं बन सकती। ऐसे में कांग्रेस को यह भली-भांति पता चल गया है कि मोदी को रोकने का एकमात्र विकल्प तीसरा मोर्चा ही हो सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि जो राहुल गांधी ‘गो-सिंगल’ यानी ‘अपने दम पर सरकार बनाओ’ का नारा बुलंद कर रहे थे, वही अब पार्टी की साख बचाने के लिए गठबंधन की राजनीति की ओर अग्रसर हो रहे हैं और उन लोगों को भी बाहर से समर्थन देने की सोच रहे हैं जो भ्रष्टाचार में भी संलिप्त हैं। क्या मोदी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आएगी या फिर कांग्रेस की नई रणनीति कामयाब होगी और उसके समर्थन से तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी, यह तो समय ही बताएगा क्योंकि फाइनल परिणाम तो वोटरों को ही तय करना है।


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