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बिना बिजली के रह रहे सात करोड़ परिवार

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Monday, February 03, 2014-1:27 PM

नई दिल्ली: देश में एक ओर जहां पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पाद के आयात पर प्रति वर्ष खरबों रुपये खर्च हो रहे हैं वहीं साढ़े सात करोड़ ऐसे परिवार हैं जो उनके क्षेत्रों में बिजली न पहुंचने के कारण 21वीं सदी में भी अंधेरे में जीवन बिता रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर सांसदों के समूह की ओर से तैयार कराई गई ताजा रिपोर्ट में सरकार की ऊर्जा नीति की खामियों को उजागर करते हुए बताया गया कि  2012 में अप्रैल से नवंबर तक पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर नौ खरब रुपये खर्च किए गए जिसके कारण इस अवधि में व्यापार घाटा 10.37 खरब रुपये पहुंचं गया।

 

वर्ष 2013-14 में किरोसिन और रसोईं गैस पर 300 अरब रुपये की सब्सिडी दी गई। सरकार ने 2001-02 में लक्ष्य रखा था कि 2012 तक हर घर में बिजली पहुंच जाएगी लेकिन अभी भी साढ़े सात करोड़ परिवारों तक बिजली नहीं पहुंची है। हालांकि बाद में इस लक्ष्य को 2017 तक के लिए टाल दिया गया। बिजली की खपत में असमानता को रेखांकित करते हुए बताया गया कि शहरों में प्रति व्यक्ति एक माह में 24 यूनिट बिजली की खपत के मुकाबले गांवों में यह मात्र आठ यूनिट है।

 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता राजीव प्रताप रूड़ी की अध्यक्षता में जलवायु परिवर्तन पर सांसदों के समूह के प्रतिनिधिमंडल ने आज यह रिपोर्ट नवीन एवं नवीकरणीय ‘वित्त बिजली’ तेल एवं प्राकृतिक गैस समेत विभिन्न मंत्रालयों को सौंपी। विभिन्न दलों के सांसदों का यह समूह अक्षय ऊर्जा को बढावा देने के लिए सरकार पर दबाव बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार यदि घरेलू उत्पादन पांच प्रतिशत की दर से हुआ तो अगले 45 वर्षों में देश का समस्त कोयला भंडार समाप्त हो जाएगा।

 

अक्षय ऊर्जा के लिए सरकार के विभिन्न विभागों ने अलग-अलग और अल्पकालिक लक्ष्य रखा है जिससे निवेशकों एवं निर्माताओं में विश्वास नहीं जम पा रहा है। इस खामी को दूर करने के लिए इस ऊर्जा के लिए दीर्घकालिक एकल लक्ष्य रखने की सिफारिश की गई। दूरदराज इलाकों में भी हर घर में स्वच्छ बिजली पहुंचाने के लिए 10 वर्ष का लक्ष्य निर्धारित करने और इसे हासिल करने के लिए राष्ट्रीय ऊर्जा उपलब्धता मिशन एवं कोष बनाने के साथ ही अक्षय ऊर्जा के लिए कानून बनाने की सिफारिश की गई है।

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