‘आप’ के कारण मायावती ने बदली रणनीति!

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Wednesday, February 05, 2014-9:58 AM

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर बसपा प्रमुख मायावती भी आम आदमी पार्टी (आप) के बढ़ते प्रभाव से बच नहीं पाईं और उन्हें अपनी रणनीति बदलने को मजबूर होना पड़ा। वर्ष 2012 में उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपनी हार के बाद मायावती का न सिर्फ कद नीचा  हुआ बल्कि उन्होंने इसके बाद चुप्पी भी धारण कर ली थी।  मगर 15 जनवरी को लखनऊ में बसपा की स्वाभिमान रैली में इस चुप्पी को तोड़ते हुए उन्होंने अपनी भावी चुनावी रणनीति में बदलाव यानी कि अकेले चुनाव लडऩे का संकेत दिया। दरअसल मायावती की केन्द्र में प्रधानमंत्री बनने की बड़ी महत्वाकांक्षा थी, जिसके कारण उन्होंने उत्तरप्रदेश में अपने वोट बैंक पर ध्यान दिए बिना दूसरे राज्यों में बसपा का फैलाव करना शुरू  कर दिया था मगर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश में ही बसपा को
बरदस्त धक्का लगा। 

2012 के चुनावों में न सिर्फ उनकी पार्टी हार गई, बल्कि मायावती की दलित वोटों पर पकड़ भी कमजोर हो गई। 2012 के विधानसभा चुनावों में बसपा का मत हिस्सा हिमाचल में 5.8 प्रतिशत और उत्तरप्रदेश में 4.5 प्रतिशत कम हुआ। गुजरात में 1.35 प्रतिशत मतों में कटौती हुई। 2013 में बसपा का कर्नाटक में मतों का हिस्सा 1.7 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 1.8 प्रतिशत, दिल्ली में 8.8 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 2.7 प्रतिशत और राजस्थान में 4.2 प्रतिशत कम हुआ।

माया के नजदीकी सूत्रों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी को अपना प्रत्याशी बनाए जाने के बाद उत्तरप्रदेश में मोदी की लहर जोर पकडऩे लगी, मगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनने और दूसरे राज्यों में भी आप का फैलाव होने से मोदी की लहर पर कुछ अंकुश लगा। मायावती ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद सोचा था कि कांग्रेस के साथ बसपा गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़ेगी मगर आम आदमी पार्टी का प्रभाव बढऩे और कांग्रेस के उसका साथ देने से माया को कांग्रेस का पतन दिखाई देने लगा। सूत्रों के अनुसार माया ने सोचा कि अगर आप ने दिल्ली की तरह उत्तरप्रदेश में भी कांग्रेस वोटों को काट दिया तो बसपा को भी नुक्सान होगा। ऐसे में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से न सिर्फ उनका वोट शेयर गिर जाएगा बल्कि सीटों की संख्या भी कम हो जाएगी,  इसलिए मायावती ने अकेले ही चुनाव लडऩा उचित समझा।

2009 के लोकसभा चुनावों में 80 सांसदों में से 43 सांसद 25 प्रतिशत और 35 प्रतिशत वोटों से विजयी हुए थे। 2014 के चुनावों में पंचकोणा (कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा और आप) मुकाबला होने से मतों का आधार और गिर सकता है। अगर मायावती अकेले चुनाव लड़ती हैं तो उनका लगभग 30 सीटों पर विजय प्राप्त करने का लक्ष्य है, जो केन्द्र में यू.पी.ए. या राजग को समर्थन देने के लिए पर्याप्त होगा। अगर सीटें अधिक आईं तो वह खुद तीसरे मोर्चे को साथ मिला कर प्रधानमंत्री बन सकती हैं या फिर यू.पी.ए. अथवा राजग, जिसकी सीटें अधिक हुईं, को समर्थन देकर सरकार बनवाने पर विचार कर सकती हैं।


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