जेल में बंद आरोपियों के चुनाव लडऩे की अनुमति वाले कानून को उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा

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Thursday, February 06, 2014-8:52 PM
नई दिल्ली : जेल में बंद आरोपियों को चुनाव लडऩे की अनुमति देने का प्रावधान करने वाले कानून को दिल्ली उच्च न्यायालय ने सही ठहराते हुए बरकरार रखा।  गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने पहले अपने फैसले में जेल में बंद व्यक्तियों के चुनाव लडऩे पर पाबंदी लगा दी थी।
 
मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने फैसला दिया कि किसी गिरफ्तार आरोपी या विचाराधीन कैदी को इस आधार पर चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं देना कि जेल में बंद रहने के दौरान उसे वोट देने का अधिकार नहीं है, इससे बदले की राजनीति का मार्ग खुलेगा।
 
 न्यायालय ने केंद्र के संशोधन एवं वैधीकरण अधिनियम 2013 को वैध ठहराया जिसने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया ताकि गिरफ्तार व्यक्ति चुनाव लड़ सकें । न्यायाधीशों ने 23 पेज के फैसले में कहा, हमारे विचार से जेल में बंद व्यक्ति के वोट नहीं देने के अधिकार से चुनाव में खड़े नहीं होने के अधिकार को जोडऩा सत्तारूढ़ दलों द्वारा बदले की राजनीति का दरवाजा खोलेगी ।
 
न्यायालय ने कहा कि किसी नेता या सत्तारूढ़ दल को विरोधियों को चुनाव लडऩे से रोकने के लिए सिर्फ यही करना होगा कि वह पुलिस से कहेगा कि मामला दर्ज करो और विरोधी को गिरफ्तार करो ।शीर्ष अदालत ने पिछले वर्ष 10 जुलाई को फैसला दिया था कि जो व्यक्ति जेल या पुलिस हिरासत में है वह विधायी निकायों का चुनाव नहीं लड़ सकता है ।
 
शीर्ष अदालत ने कहा था कि केवल मत देने वाला ही चुनाव लड़ सकता है और जेल मेंं बंद होने या पुलिस हिरासत में होने के कारण उसका मत देने का अधिकार खत्म हो जाता है । उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि वास्तव में संसद ने संशोधन और वैधीकरण कानून, 2013 के जरिये स्पष्ट रूप से न्यायालय की मंशा को निष्प्रभावी कर दिया था।  
 
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