अनुचित और अनैतिक है वायदे के अनुसार काम नहीं करना: HC

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Sunday, February 09, 2014-12:11 PM

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायलय ने कहा कि ‘निर्बाध रूप से विद्युत आपूर्ति’ जैसी कोई भी नीति तैयार करते समय इसके सभी पहलुओं का विश्लेषण किया जाना चाहिए क्योंकि यदि वायदे पर अमल नहीं किया गया तो यह सरकार के लिये अनुचित और अनैतिक होगा। न्यायमूर्ति अनिल आर दवे और न्यायमूर्ति ए के सीकरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी विषय वस्तु के बारे में कोई नीति तैयार करते समय शासन को इस नीति के सभी पहलुओं और लाभ देने की क्षमता के बारे में अच्छी तरह सोचना चाहिए।

न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार को सभी संबंधित पहलुओं पर अच्छी तरह से विचार किये बगैर कोई अश्वासन नहीं देना चाहिए क्योंकि यह सिर्फ वायदों के सिद्धांत का उल्लंघन ही नहीं होगा बल्कि यह अनुचित और अनैतिक भी होगा। न्यायालय ने केरल में स्थापित होने वाली चुनिन्दा नयी औद्योगिक इकाईयों को पांच साल तक निर्बाध रूप से बिजली की आपूर्ति करने की नीति 1990 में बनायी गयी थी लेकिन राज्य सरकार इस वायदे पर ठीक से अमल नहीं कर सकी।

न्यायालय ने कहा कि 21 मई, 1990 को सरकारी आदेश से घोषित नीति में यह भी आश्वासन दिया गया था कि ऐसी नयी इकाईयों को पांच साल तक विद्युत शुल्क के भुगतान के मामले में भी कुछ रियायतें दी जायेंगी। शीर्ष अदालत ने इस फैसले में केरल उच्च न्यायालय का निर्णय निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने ऐसी औद्योगिक इकाईयों की आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया था।

औद्योगिक इकाईयों का तर्क था कि इस नीति का उन्हें वास्तव में लाभ ही नहीं मिला क्योंकि बिजली की कटौती के कारण उनके उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ा और सरकार ने पांच साल तक बिजली की कटौती से मोहलत देने का वायदा पूरा नहीं किया। शीर्ष अदालत ने औद्योगिक इकाईयों की अपील पर अपने फैसले में कहा कि इस मामले में राज्य सरकार ऐसा कोई मामला नहीं बना सकी। ऐसी स्थिति में सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह अपीलकर्ताओं से किये गये वायदे का लाभ उन्हें दे।

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