रंगमंच का कलाकार ही बलि का बकरा क्यों बनता है?

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Wednesday, February 12, 2014-11:50 AM

रायपुर: मुझे यह समझ में नहीं आता कि रंगमंच का कलाकार ही बलि का बकरा क्यों बनता है? रंगकर्मी भी इंसान हैं, उनकी भी जरूरतें हैं और यह एक कटु सत्य है कि आज भी थिएटर में उतने पैसे नहीं मिलते। ऐसे में रंगकर्मी भी फिल्म में जा रहे हैं और अच्छा भी है, इससे कम से कम अच्छे कलाकार फिल्मों में आ रहे हैं। यह कहना है मशहूर रंगकर्मी नादिरा बब्बर का। वह सोमवार को राजधानी रायपुर में थी।

 

17वें मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह में शिरकत करने राजधानी पहुंची नादिरा बब्बर ने शहर के एक निजी होटल में थिएटर से जुड़ी कई बातें मीडिया के सामने रखीं। उन्होंने कहा कि आज के नाटकों में लगातार नवाचार हो रहा है और होना भी चाहिए, क्योंकि समय के साथ थिएटर में बदलाव की दरकार है। उन्होंने ऐसे निर्देशकों को भी आड़े हाथों लिया, जो नाटक अपने अहम को खुश करने के लिए तैयार करते हैं।

 

थिएटर के लिए सरकार की ओर से कुछ न किए जाने के सवाल पर नादिरा बब्बर का कहना था कि वे सोचते हैं कि दिल्ली ही पूरी हिंदुस्तान है और वहीं पर थिएटर में पैसे खर्च किए जाने चाहिए। अगर नाटक के लिए करोड़ों खर्च करने के बजाय हर शहर में होने वाले छोटे रंगमंच पर एक चौथाई हिस्सा भी खर्च किया जाए तो थिएटर की स्थिति ही कुछ और होगी।

उन्होंने कहा कि नाटक में मनोरंजन के साथ एक ऐसा संदेश भी जरूर होना चाहिए, जिसे दर्शक अपने साथ घर ले जा सकें, क्योंकि नाटक मनोरंजन के साथ सामाजिक विकास और उत्थान का कार्य भी करता है। लोग हिंदी फिल्म को बहुत गाली देते हैं, लेकिन हिंदी फिल्में आज भी अच्छी बन रही हैं। इतनी बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में इतने अच्छे काम हो रहे हैं, जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ को ही देख लो। कितनी शानदार फिल्म, कितना अच्छा मैसेज दिया गया है इसके माध्यम से। अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘जय हो’ के अनुभव के बारे में उन्होंने कहा कि फिल्म के कारण आज छोटे-छोटे बच्चे भी मुझे पहचानने लगे हैं। आज ही मुंबई से आते वक्त फ्लाइट में लोग मेरी फोटो निकाल रहे थे।


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