बदली दिल्ली की सियासी तस्वीर

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Sunday, February 16, 2014-12:05 AM
नई दिल्ली(अशोक शर्मा): केंद्रीय मंत्रिमंडल के दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने की मंजूरी दिए जाने के बाद दिल्ली के राजनीतिक समीकरण एकदम बदलने शुरू हो गए हैं। बेशक केंद्र सरकार की इस सिफारिश से आम आदमी पार्टी को धक्का लगा है लेकिन विधानसभा भंग कर तत्काल चुनाव करवाने की अरविंद केजरीवाल की सिफारिश को दरकिनार कर एक तरीके से ब्रैक लग गया है। लगता है कि अगले कुछ समय के लिए दिल्ली एक बार फिर से चुनाव की दहलीज पर जाकर खड़ी होने से बच गई है। 
 
कांग्रेस चाहती भी यही थी कि दिल्ली पर कुछ महीनों के बाद फिर से चुनाव का बोझ नहीं लादा जाना चाहिए। सच्चाई यह है कि कांग्रेस के ही नहीं बल्कि भाजपा के विधायक भी यही चाहते थे क तत्काल दोबारा चुनाव नहीं होने चाहिए। एक तरीके से केंद्र सरकार के इस निर्णय से उनके मन की मुराद पूरी हो गई है। अब जहां तक सरकार बनाने का सवाल है, तो विधानसभा में मात्र 8 सदस्यों वाली कांग्रेस किसी स्थिति में नहीं है कि वह सरकार बना सके। भाजपा जरूर कुछ कर सकती है और अब उसके नेताओं के बीच इसी बात पर मंथन चल रहा है।
 
 दरअसल दिल्ली में कांग्रेस के सहयोग से आप की सरकार बनने के बाद कांग्रेसी समझते थे, हो सकता है कि केजरीवाल सरकार चलाने में नीतिगत निर्णय लेने में उनसे सलाह-मश्विरा करते रहेंगे लेकिन मुख्यमंत्री का नजरिया कुछ ओर ही कह रहा था। 
 
शपथ लेने के बाद जब मुख्यमंत्री  ने कांग्रेस के नेताओं को निशाना बनाकर उन्हें भ्रष्ट कहना शुरू किया तो कांग्रेसी नेताओं की सोच बदलनी शुरू हो गई थी। केजरीवाल ने जब जनलोकपाल बिल को विधानसभा में पेशकर उसे पारित करने की घोषणा की, तो उसके बाद से ही कांग्रेस के नजरिए में बदलाव आना शुरू हो गया।   उसके बाद केजरीवाल बिल पेश करने के मुद्दे पर अड़ गए और उन्होंने उपराज्यपाल और संविधान पर ही सवाल खड़े कर दिए। 

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