बसपा के लिए फायदेमन्द रही सियासी ‘दोस्ती’

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Sunday, February 16, 2014-1:33 PM

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सियासी नक्शे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसके लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ ‘दोस्ती’ फायदेमन्द रही। दोस्ती का हाथ मिलाकर बसपा ने मुकाम हासिल किया और राह मिलते ही हाथ झटक कर निकल गई। बसपा के साथ हाथ मिलाने का खमियाजा भी भाजपा, सपा व कांग्रेस को भुगतना पड़ा है। गठबंधन की नीति ने बसपा को राजनीति के शिखर तक पहुंचा दिया। बसपा नेतृत्व को सत्ता का स्वाद मिलते ही यह एहसास हो गया कि दलित उत्थान के नारे पर सत्ता हथियाई नहीं जा सकती है और इसके लिए सर्व समाज का नारा देकर सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की रणनीति बनायी और इससे उसे एक नई पहचान भी मिली।
 
अहम बात यह भी है कि लोकसभा चुनाव अपने दम पर अकेले लडऩे वाली बसपा विधानसभा के चुनावों में गठबंधन करके प्रदेश में अपनी ताकत को धीरे-धीरे बढ़ाती गई। वर्ष 1984-85 से लेकर वर्ष 1992 तक विधानसभा चुनावों में बसपा गठबंधन की राजनीति से दूर रही। वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में बसपा को बारह व 1991 के चुनाव में तेरह सीटें मिलीं। बसपा को शुरुआती दिनों में भाजपा, कांग्रेस और सपा जैसे प्रमुख दलों ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया।

बसपा के राजनीतिक सफर में वर्ष 1993 का विधानसभा चुनाव वह मोड़ था, जहां से पार्टी ने गठबंधन का नया पाठ सीखा। पहली बार बसपा ने सपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा। पार्टी ने 164 उम्मीदवार मैदान में उतारे, जिसमें 67 सीटों पर जीत हासिल की। इन सीटों पर 28.53 फीसदी वोट हासिल करके बसपा ने पहली बार कांग्रेस को पछाड़ा और प्रदेश की राजनीति में अपनी ताकत का एहसास कराया।

अपनी कामयाबी के बाद पहली बार बसपा ने एक जून 1995 में सपा को झटका दिया। इसी दिन पार्टी ने सपा से समर्थन वापस ले लिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि दूसरे ही दिन दो जून को सपा कार्यकताओं ने गेस्ट हाऊस में मायावती पर हमला बोल दिया। दो जून वर्ष 1995 में गेस्ट हाउस कांड की घटना से बेहद कड़वाहट के साथ यह गठबंधन टूटा और भाजपा के समर्थन से बसपा प्रदेश में पहली बार सरकार बनाने में सफल रही।

वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 69 सीटें मिलीं। सोलह महीने बाद बसपा-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी। दोनों में छह-छह माह सत्ता संभालने पर करार हुआ। इसके विपरीत छह माह के कार्यकाल के बाद जब भाजपा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया। वर्ष 2002 में तीसरी बार भाजपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी, लेकिन यह भी ज्यादा दिन नहीं चल सकी। इसके बाद से उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा की एक दूसरे से खिलाफत का सिलसिला आज तक जारी है।


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