पुस्तक मेला में क्षेत्रीय भाषाओं का संगम

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Tuesday, February 18, 2014-2:01 AM
नई दिल्ली(अशोक चौधरी): नई दिल्ली में हो रहे 22वें विश्व पुस्तक मेले में यूं तो हिंदी और अंग्रेजी प्रकाशकों की ही भरमार रहती है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय भाषाओं की किताबों की मौजूदगी कम नहीं है। गुम होती बोली और भाषाओं के बीच साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर चर्चा होती रहती है।
 
ऐसे में अपनी भाषा की किताबों के पे्रमियों के लिए पुस्तक मेला एक ही छत के नीचे असमिया, उडिय़ा और तमिल सहित देश की लगभग सभी क्षेत्रीय भाषा की पुस्तकें मुहैया करा रहा है। मेले में क्षेत्रीय भाषा के प्रकाशकों के हॉल संख्या 14 आरक्षित किया गया है। पुस्तक मेले में आए एक पुस्तक प्रेमी का कहना है कि राजधानी में विविध भाषा और बोली के लोग रहते है, उन्हें अपनी भाषा की किताब की अवश्कता महसूस होती रहती है।
 
दिल्ली में हिंदी और अंग्रेजी की पुस्तकें आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन क्षेत्रीय भाषा की किताबें मिलना मुश्किल होता है। वे पिछले बार भी कई किताबें खरीद चुकें हैं। उड़ीसा के रहने वाले रमेश नारायण साहू का कहना है कि इससे यह बहुत अच्छी पहल है। इससे उनके बच्चे भी अपनी माटी की भाषा को जानते रहेंगे। प्रकाशकों का मानना है कि इससे उनको भी अपनी भाषा के साहित्य को अपने लोगों तक पहुंचाने में आसानी होती है और क्षेत्रीय लेखकों का परिचय भी होता है।  

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